गुरु ग्रंथ साहिब 95 · Raag Maajh
1माझ महला ४ ॥
2हमें हरि-परमेश्वर की महिमा को ही पढ़ना चाहिए और हरि की महिमा का ही चिन्तन करना चाहिए।
3सदैव ही हरि नाम की कथा को सुनना चाहिए
4तथा संतों की सभा में मिलकर हरि की महिमा-स्तुति का गायन करना चाहिए; इस प्रकार भवसागर से पार हुआ जा सकता है॥१॥
5हे मेरी सखियो ! आओ हम हरि मिलन का प्रयास करें।
6कोई मुझे मेरे प्रियतम का संदेश दे जाए।
7केवल वही मेरा मित्र एवं सखा है, वही प्रियतम एवं बन्धु है, जो मुझे नरसिंह-हरि का मार्गदर्शन करता है॥२॥
8मेरी वेदना को पूर्ण हरि-रूप गुरु जी समझते हैं।
9मैं प्रभु का नाम सिमरन किए बिना रह नहीं सकता।
10हे मेरे पूर्ण गुरदेव जी ! मुझे नाम मंत्र रूपी औषधि दीजिए एवं हरि के नाम द्वारा मेरा उद्धार कर दीजिए॥ ३॥
11मैं दीन चातक हूँ और सतिगुरु की शरण में आया हूँ!
12गुरु जी ने हरि प्रभु के नाम की बूंद मुख में डाली है।
13हरि जल का समुद है और मैं उस जल की मछली हूँ। हे नानक ! इस जल के बिना मैं मर जाती हूँ ॥४॥३ ॥
14माझ महला ४ ॥
15हे मेरे हरि के संतजनों ! हे भाइओ ! मुझे मिलो।
16मुझे मेरे हरि प्रभु बारे बताओ, क्योंकि मुझे हरि के दर्शनों की भूख लगी हुई है।
17हे जगत् के जीवन दाता ! मेरी मनोकामना पूरी करो ; हरि से मिलकर उसके दर्शन करके मेरा मन प्रसन्न हो जाएगा ॥१॥
18सत्संग में मिलकर मैं हरि की वाणी बोलता हूँ।
19हरि की कथा मेरे मन को बहुत अच्छी लगती है।
20हरि का हरि नाम रूपी अमृत मेरे मन को मधुर लगता है; गुरु से भेंट करके मैं नाम अमृत का पान करता हूँ॥२ ।
21भाग्यशाली व्यक्ति हरि की संगति प्राप्त करता है।
22किन्तु भाग्यहीन मनुष्य भ्रम में भटकते और चोटें सहते हैं।
23भाग्य के बिना सत्संगति नहीं मिलती; सत्संग के बिना मनुष्य पापों की मलिनता के साथ लथपथ हो जाता है।॥३॥
24हे मेरे प्रियतम ! हे जगजीवन ! आकर मुझे दर्शन दीजिए।
25अपने मन में दया धारण करके मुझे हरि नाम प्रदान कीजिए।
26गुरु के उपदेश से मेरे मन को हरि-नाम मधुर एवं अच्छा लगने लग गया है; हे नानक ! मेरा मन हरि नाम से भीग गया है ॥४ ॥४ ॥
27माझ महला ४ ॥
28मैंने हरि बारे गुरु के दिए ज्ञान द्वारा हरि-रस प्राप्त किया है।
29जब गुरु ने मुझे हरि-रस का पान करवाया तो मेरा मन हरि के प्रेम में मग्न हो गया।
30मैं हरि का हरिनाम अपने मुख से बोलता रहता हूँ; मेरा मन हरि रस पान करने को उत्सुक होता है॥१॥
31हे संतजनो ! आओ और मुझे अपने गले से लगाओ।
32मेरे प्रियतम प्रभु की कथा सुनाओ।
33हे हरि के संतजनो ! मुझे मिलो ; जो मेरे मुंह में गुरुवाणी डालता है, मैं उसे अपना मन अर्पण कर दूँगा ॥२॥
34पूर्ण सौभाग्य से ईश्वर ने मुझे अपने संत से मिला दिया है।
35पूर्णगुरु ने मेरे मुख में हरि-रस डाल दिया है।
36भाग्यहीन मनुष्य को सतिगुरु प्राप्त नहीं होता; मनमुख व्यक्ति सदा गर्भ-योनि में प्रवेश करता है॥३॥
37दयालु ईश्वर ने स्वयं मुझ पर दया की है
38और उसने अहंकार की समस्त विषैली मलिनता हटा दी है।
39हे नानक ! गुरमुख मनुष्य देह रूपी नगर में इन्द्रिय रूपी दुकानों पर ईश्वर के नाम का सौदा खरीदते हैं।॥४॥५॥
40माझ महला ४ ॥
41मैं गोविन्द का गुणानुवाद करता हूँ और हरि नाम का ध्यान करने में ही मग्न रहता हूँ।
42मैं सत्संग में मिलकर नाम को अपने मन में बसाता हूँ।
43मेरा स्वामी हरि-प्रभु अगम्य एवं अगोचर है तथा सतिगुरु से मिलकर मैं हरि-रस का आनंद प्राप्त करता हूँ॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं