गुरु ग्रंथ साहिब 959 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji
1गुरु ने मुझे बड़े मालिक प्रभु से मिला दिया है, जिसने सारे जगत् का उद्धार कर दिया है।
2मेरी तकदीर में आरम्भ से ही प्रभु का संयोग लिखा हुआ था और अब मेरी मनोकामना पूरी हो गई है।
3हे नानक ! जिसने सत्य-नाम प्राप्त कर लिया है, वह सदा ही सुख-आनंद भोगता रहता है॥ १॥
4महला ५॥
5मनमुख जीवों की दोस्ती माया का ही संबंध है।
6वे पक्की दोस्ती कभी नहीं रखते और देखते ही देखते भाग जाते हैं।
7उनका रिश्ता तब तक ही कायम रहता है, जब तक उन्हें पहनने को वस्त्र एवं खाने को भोजन मिलता रहा है।
8जिस दिन उन्हें कुछ भी नहीं मिलता, उस दिन वे गाली-गलौच करते हैं।
9ऐसे मनमति अज्ञानी एवं अंधे हैं, जो दिल की गहराई को नहीं जानते।
10कीचड़-गारे से भरे हुए पत्थरों के बांध की तरह झूठी दोस्ती अधिक देर नहीं चलती।
11अन्धे मनमुखी जीव अपने आत्मज्ञान को नहीं जानते और व्यर्थ ही दुनिया के धंधों में सिर पीटते रहते हैं।
12इस प्रकार झूठे मोह में फंसकर आत्माभिमान करते हुए उनकी पूरी जिंदगी व्यतीत हो जाती है।
13जिस पर ईश्वर अपनी कृपा करता है, वह प्रारम्भ से ही पूर्ण करम कर देता है।
14हे नानक ! वही व्यक्ति उबरे हैं, जो सतगुरु की शरण में आए हैं। २॥
15पउड़ी।
16जो परमात्मा के दीदार में ही लीन रहते हैं, वही सच्चे संत कहलाते हैं।
17जिन्होंने मालिक को पहचान लिया है, उनके चरणों की धूलि क्योंकर मिल सकती है ?
18उनकी संगत में विकारों से भरा मैला मन भी पावन हो जाता है।
19जीव का भ्रम रूपी कपाट खुल जाता है और सत्य का घर नज़र आने लग जाता है।
20परमेश्वर जिसे अपना घर दिखा देता है उसे फिर धक्का नहीं लगता।
21जिस व्यक्ति की ओर ईश्वर जरा-सी करुणा-दृष्टि से देख लेता है, उसका मन एवं तन निहाल हो जाता है।
22गुरु के शब्द में ध्यान लगाने से नाम रूपी नौ निधियाँ प्राप्त हो जाती हैं।
23संतों की चरण-धूलि उन्हें ही मिलती है, जिसके मस्तक पर उत्तम भाग्य होता है। ५॥
24श्लोक महला ५॥
25हे मृगलोचना ! मैं तुम्हें एक सच्ची बात सुनाती हूँ, जो तेरा उद्धार कर देगी।
26हे छबीली ! तुम मेरा सुन्दर वचन सुनो, तेरा प्रियवर ही तेरे मन का आधार है।
27तूने दुष्ट मुझे यह तो बता इसका क्या कारण है ?
28जीवात्मा जवाब देती है कि मुझ में किसी प्रकार की कोई त्रुटि नहीं है और किसी गुण से भी विहीन नहीं हूँ।
29परन्तु दुर्मति के कारण दुर्भाग्य से अपने छेल छबीले प्रियतम को गंवा दिया है।
30न ही मैं भूली हुई हूँ, ना ही मैंने कोई गलती की है न है मुझ में कोई दोष है।
31जिधर मुझे मेरे स्वामी ने लगाया है, उधर ही लग गई हूँ, तू मेरा सच्चा संदेश सुन।
32वही जीव-स्त्री सुहागिन है, वही भाग्यवान् है, जिस पर प्रिय-प्रभु अपनी कृपा करता है।
33फिर प्रियतम उसके सभी अवगुण दूर करके गले से लगाकर उसे संवार देता है।
34हे नानक ! भाग्यहीन जीव रूपी नारी विनती करती है कि हे प्रभु! मेरी बारी कब आएगी ?
35सब सुहागिनें तेरे साथ आनंद करती रहती हैं, इसलिए मुझे एक रात का ही आनंद प्रदान कर दो॥ १॥
36महला ५॥
37अरे मन ! तू क्यों डगमगाता है? ईश्वर सब कामनाएँ पूर्ण करने वाला है।
38तू सतगुरु का ध्यान किया कर, वह सभी दुखों को भुलाने वाला है।
39हे मन ! हरि-नाम की आराधना करने से सभी किल्विष एवं विकार दूर हो जाते हैं।
40जिनकी तकदीर में पूर्व से ही लिखा होता है, उसे ही निराकार की स्मृति का रंग लगता है।
41ऐसे भक्त ने माया का स्वाद छोड़कर नाम रूपी अपर धन का संचय कर लिया है।
42वह आठो पहर ईश्वर के ध्यान में ही लीन रहता है और उसके अपार हुक्म का ही पालन करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं