सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 956 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1सत्य कभी पुराना होता ही नहीं और यह एक बार सिलाई किया हुआ कभी फटता ही नहीं।

2हे नानक ! सच्चा परमेश्वर सदैव शाश्वत है, पर जीव को यह बात तब तक ही सत्य लगती है, जब तक वह नाम जपता रहता है॥ १॥

3महला १॥

4यदि सत्य की छुरी हो और सत्य ही उसका समूचा लोहा हो,

5तब इसकी बनावट बहुत ही सुन्दर होती है

6जब यह छुरी शब्द की सान पर रखकर तीक्ष्ण की गई हो और

7इसे गुणों की म्यान में डालकर रख दिया जाए ।

8हे शेख ! यदि कोई जीव उस छुरी से मारा गया हो तो

9तू देख लेगा कि उस में लोभ रूपी लहू निकल गया है।

10जो जीव इस प्रकार हलाल हो जाता है, वह खुदा से जाकर जुड़ जाता है।

11हे नानक ! वह खुदा के द्वार पर उसके दर्शन में लीन हो जाता है॥ २॥

12महला १॥

13हे नानक ! जिस व्यक्ति ने अपनी कमर में सुन्दर कटार धारण की हुई है और कुशल घोड़े पर सवार है,

14उसे इस बात का अभिमान नहीं करना चाहिए, कहीं उसके सिर पर अभिमान करने से पापों का भार न आ पड़े॥ ३॥

15पउड़ी॥

16जो व्यक्ति गुरु के निर्देशानुसार चलते हैं, वही सत्संगति में शब्द-ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं।

17वही सत्यवादी हैं, जो सत्य का ध्यान-मनन करते हैं और जिनके पास अन्तिम क्षणों में यात्रा व्यय के लिए हरि-नाम रूपी धन है।

18भक्तजन भगवान का गुणगान करते हुए बहुत सुन्दर लगते हैं और गुरु-मतानुसार अडिग रहते हैं।

19गुरु के शब्द द्वारा रत्न जैसे अमूल्य नाम का विचार उनके मन में निवास कर गया है।

20ईश्वर स्वयं ही गुरु से साक्षात्कार करवा कर अपने साथ मिला लेता है और स्वयं ही भक्तों को सम्मान देता है। १६॥

21श्लोक महला ३॥

22सारी दुनिया आशा में ही फँसी हुई है परन्तु कोई विरला ही आशाहीन होकर जीता है।

23हे नानक ! जो मरजीवा होता है, उसका ही जीवन सफल होता है॥ १॥

24महला ३॥

25आशा के हाथ में कुछ भी नहीं है, फिर मनुष्य कैसे आशाहीन हो सकता है?

26जब परमेश्वर स्वयं ही जीव को भुला देता है तो यह बेचारी आशा क्या कर सकती है?॥ २॥

27पउड़ी॥

28सच्चे नाम के बिना संसार में जीना धिक्कार योग्य है।

29प्रभु ही देने वाला दातार है और यह धन ही निश्चल रहता है।

30वही व्यक्ति निर्मल है, जो श्वास-श्वास से आराधना करता रहता है।

31अपनी रसना से अन्तर्यामी, अगम्य ईश्वर का भजन करते रहो।

32नानक तो उस सर्वव्यापकं परमेश्वर पर ही बलिहारी जाता है॥ २०॥

33श्लोक महला १॥

34गुरु रूपी सरोवर एवं गुरुमुख रूपी हंसो का मिलाप प्रारम्भ से ही लिखा हुआ है और परमेश्वर को यही मंजूर होता है।

35गुरु रूपी सरोवर में शुभ गुण रूपी हीरे-मोती गुरुमुख रूपी हंसों का भोजन है।

36मनमुख रूपी कोई बगुला एवं कौआ चाहे बहुत चतुर हो, कभी गुरु रूपी सरोवर में नहीं रहता।

37उनका भोजन वहाँ सरोवर में नहीं होता अपितु कहीं और ही उनका भोजन बना होता है।

38सत्य की साधना करने से सत्य ही प्राप्त होता है परन्तु झुठ कमाई करने से केवल झूठा मान ही मिलता है।

39हे नानक ! सच्चा गुरु उन्हें ही मिला है, जिनकी तकदीर में आरम्भ से ही ऐसा लिखा है॥ १॥

40महला १॥

41मेरा मालिक पवित्र है, यदि कोई श्रद्धा से उसे याद करता है तो वह भी पावन हो जाता है।

42हे नानक ! उस मालिक की ही भक्ति करनी चाहिए, जो हमें सदा ही देता रहता है।

43हे नानक ! उसकी ही उपासना करनी चाहिए, जिसकी उपासना करने से दुखों से छुटकारा हो जाता है।

44अवगुण दूर हो जाते हैं, गुण हृदय में बस जाते हैं और मन में सुखों का निवास हो जाता है॥ २॥

45पउड़ी।

46परमेश्वर स्वयं ही समूचे जगत् में विद्यमान है और स्वयं ही उसने समाधि लगाई हुई है।

47वह स्वयं ही उपदेश देता है और गुरु के माध्यम से सत्य में विश्वस्त करता है।

48किसी को उसने स्वयं ही भूलभुलैया में डाला हुआ है और किसी को भक्ति में लगाया हुआ है।

49जिसे वह स्वयं ज्ञान देता है वही समझता है और स्वयं ही नाम-सिमरन में लगाया हुआ है।

50हे नानक ! प्रभु-नाम का ध्यान करने से ही सच्ची बड़ाई प्राप्त होती है॥ २१॥ १॥ शुद्ध॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं