गुरु ग्रंथ साहिब 955 · Raag Raamkalee
1पउड़ी॥
2मानव-शरीर में ही दुर्ग, किला तथा सभी देश-देशान्तर की चीजें उपलब्ध हैं।
3ईश्वर ने स्वयं ही समाधि लगाई हुई है और सब जीवों में प्रवेश किया हुआ है।
4वह स्वयं ही सृष्टि-रचना करता है और खुद को गुप्त रखता है।
5गुरु की सेवा करने से ही बोध होता है और वह सत्यस्यरूप प्रगट हो जाता है।
6गुरु ने यही सूझ दी है कि सबकुछ परमसत्य ही है॥ १६॥
7श्लोक महला १॥
8पापी इन्सान के लिए सावन का महीना रात के समान है और आषाढ़ का महीना दिन के समान है। काम एवं क्रोध दोनों ही उसके लिए खेत के समान हैं।
9लालच उसके लिए विषय-विकार की फसल बोने के लिए उचित समय है और धोखा बोने वाला बीज है।
10उसके खेत में हल चलाने वाला किसान मोह है और उसका मंदा विचार ही जमीन को चलाने के लिए हल है। उसने पापों की फसल से पाप रूपी अनाज का फल इकठ्ठा किया है और परमात्मा के हुक्म से ही फल प्राप्त करता है।
11हे नानक ! उसके किए कर्मो का हिसाब मांगते समय ही पता चलता है कि वह जीव रूपी पिता जगत् में से संतानहीन ही गया है, क्योंकि उसने किसी पुण्य कर्म रूपी पुत्र को जन्म नर्हीं दिया॥ १॥
12महला १॥
13धर्मी इन्सान के लिए परमात्मा का डर खेत के समान है और मन की शुद्धता फसल को देने वाले जल के समान है। सत्य एवं संतोष दो बैलों के समान है और
14नम्रता हल के समान है, उसका चित्त हलवाहक एवं परमात्मा का सिमरन फसल बोने का उचित समय है, उसके लिए प्रभातकाल प्रभु से मिलाप करवाने वाला संयोग है और
15प्रभु का नाम खेत में बोने वाले बीज के समान है, परमात्मा की कृपा अनाज के समान है और उसे सारी दुनिया ही धोखा नजर आती है।
16हे नानक ! यदि परमात्मा की करुणा-दृष्टि हो जाए तो उसके सारे वियोग दूर हो जाते हैं।॥ २॥
17पउड़ी॥
18स्वेच्छाचारी जीव के मन में मोह रूपी गुबार है, जिस कारण वह द्वैतभाव की ही बातें करता रहता है।
19द्वैतभाव के कारण सदा दुख ही मिलता है और वह नित्य ही दूध के भ्रम में जल को विलोता रहता है।
20यदि गुरुमुख बनकर नाम का ध्यान किया जाए तो मंथन करके परमतत्व प्राप्त हो जाता है।
21अन्तर्मन में प्रभु-ज्योति का प्रकाश हो जाता है और खोजकर भगवान को प्राप्त कर लेता है।
22ईश्वर स्वयं भ्रम में डालकर कुमार्गगामी कर देता है और इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता॥१७॥
23श्लोक महला २॥
24नानक कहते हैं कि हे जीव ! चिंता मत करो, चूंकि सब की चिंता ईश्वर को स्वयं ही है।
25जो जीव उसने जल में उत्पन्न किए हैं, वह उन्हें भी भोजन देता है।
26वहाँ जल में न कोई दुकान चलती है और न ही कोई कृषि करता है।
27वहाँ बिल्कुल ही कोई सौदा नहीं होता, न ही केिसी का कोई लेन-देन होता है।
28वहीं जीवों का आहार जीव ही बनते हैं।
29उसने जो जीव समुद्र में पैदा किए हैं, उनकी देखभाल भी वह स्वयं ही करता है।
30हे नानक ! कोई चिंता मत करो, चूंकि सब की चिंता ईश्वर को स्वयं ही है॥ १॥
31महला १॥
32हे नानक ! यह जीव मछली है और तृष्णा काल रूपी मछुवा है।
33अन्धा अर्थात् ज्ञानहीन मन भगवान को याद नहीं करता और अकस्मात् ही उसे मृत्यु का जाल आ पड़ता है।
34हे नानक ! मनुष्य का चित्त नासमझ है, इसलिए चिंता का बंधा हुआ यह यमपुरी को जाता है।
35यदि भगवान अपनी करुणा-दृष्टि कर दे तो वह स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है॥ २॥
36पउड़ी।
37वे लोग सदैव सत्यशील हैं, जिन्होंने नाम रूपी हरि-रस का पान किया है।
38जिन्होंने सत्य का सौदा किया है, गुरु के माध्यम से सच्चा प्रभु उनके मन में बस गया है।
39सबकुछ हृदय-घर में ही उपलब्ध है, परन्तु भाग्यशाली ने ही उसे प्राप्त किया है।
40भगवान का गुणानुवाद करने से उनके अन्तर्मन की तृष्णा समाप्त हो गई है।
41ईश्वर ने स्वयं ही उन्हें गुरु से मिलाकर अपने साथ मिला लिया है और स्वयं ही ज्ञान प्रदान किया है। १८॥
42श्लोक महला १॥
43जैसे कपास को बेलकर रूई को कातकर कपड़ा बुना जाता है।
44फिर कपड़े को काट-फूट कर धोने के लिए भट्टी में डाल दिया जाता है।
45लोहे की कैंची कपड़े को काटती है और दर्जी उस कपड़े को फाड़ता है, फिर सूई और धागे से कपड़े को सिलाई कर दिया जाता है।
46हे नानक ! इसी प्रकार मनुष्य की खोई हुई इज्जत भगवान की स्तुति करने से हासिल हो जाती है और फिर वह शिष्ट जीवन बिताता है।
47यदि कपड़ा पुराना होकर फट जाए तो सूई एवं धागे से उसे सिलाई कर लिया जाता है।
48यह सिलाई किया हुआ कपड़ा महीना या १५ दिन ही चलता है और घड़ी-मुहूर्त कुछ समय ही चलता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं