सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 954 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1तदन्तर वन में सीता एवं लक्ष्मण से बिछुड़ गया था।

2अपनी सोने की लंका को गंवाकर रावण बहुत दुखी हुआ, जिसने छल से साधु का वेष धारण करके सीता का हरण कर लिया था।

3एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान जब पाँचों पांडव राजा वैराट के नौकर बनकर रह गए तो वे बड़े पछताए, जिनका स्वामी कृष्ण उनके साथ रहता था।

4पांडवों का पड़पौत्र राजा जनमेजय प्रायश्चित का मौका गवाकर बड़ा पछताया और

5वह एक ही भूल के कारण पापी बन गया था।

6शेख, पीर भी चिंता में रोते हैं कि

7कहीं अंत में उन्हें भी कोई विपति न आ पड़े।

8राजा भर्तृहरि एवं राजा गोपी चंद सरीखे राजे कान छिदवा कर रोते रहे और

9वे घर-घर जाकर भिक्षा भाँगते रहे।

10कंजूस आदमी अपना संचित किया हुआ धन गंवाकर बहुत रोता है और

11पण्डित अपना ज्ञान गंवाकर पछताते हैं।

12अपने जीवन साथी के बिना कुंवारी कन्या भी रोती है।

13हे नानक ! सारा संसार ही दुखी है।

14जो नाम का मनन करता है,

15वह अपनी जीवन-बाजी जीत कर जाता है, अन्य कोई भी कर्म साकार नहीं होता॥ १॥

16महला २॥

17ईश्वर का नाम सिमरन करने एवं उसमें अटूट आस्था रखने से ही जप-तप इत्यादि कर्मो का फल मिल जाता है तथा अन्य सभी कार्य व्यर्थ हैं।

18हे नानक ! ईश्वर में आस्था रखने वाला ही दरगाह में शोभा का पात्र बनता है, लेकिन गुरु की कृपा से ही इस तथ्य की सूझ होती है॥ २॥

19पउड़ी॥

20परमेश्वर ने आरम्भ से ही शरीर एवं आत्मा का मिलन लिखा हुआ है।

21वह सब जीवों में गुप्त ही विद्यमान है लेकिन गुरु ने ही उसे प्रगट किया है।

22जो परमात्मा का गुणगान करता है, गुणों को जपता रहता है, वह उसके गुणों में ही समाया रहता है।

23वह सत्यस्वरूप स्वयं ही सच्ची वाणी है और उस सत्य के सागर ने स्वयं ही साथ मिलाया है।

24परमेश्वर स्वयं ही सबकुछ है और वह स्वयं ही जीवों को बड़ाई देता है।॥१४॥

25श्लोक महला २॥

26हे नानक ! यदि ज्ञानहीन आदमी रत्नों की परख करने के लिए जाए तो

27वह रत्नों का महत्व तो जानता ही नहीं अपितु अपनी अज्ञानता ही सिद्ध करके आएगा॥ १॥

28महला २॥

29जौहरी ने आकर अपने रत्नों की पोटली खोल दी है और

30वह रत्न रूपी वस्तु जौहरी और व्यापारियों दोनों के मन को बहुत अच्छी लग रही है।

31हे नानक ! जिन व्यापारियों के पास परखने का गुण है, वही रत्नों का व्यापार करते हैं।

32जो व्यापारी रत्नों के महत्व को नहीं जानते, वे जगत् में अन्धों की तरह भटकते रहते हैं।॥ २॥

33पउड़ी॥

34यह मानव शरीर एक किला है जिसे दो ऑखें, दो कान, मुँह, दो नासिका, गुदा एवं लिंग रूपी नौ दरवाजे लगे हुए हैं, जो प्रत्यक्ष है लेकिन दसम द्वार गुप्त रखा हुआ है।

35यह वज कपाट गुरु के शब्द द्वारा ही खुल सकता है।

36इसके भीतर अनहद ध्वनि के बाजे बजते रहते हैं, जिन्हें गुरु के शब्द द्वारा ही सुना जा सकता है।

37इसके हृदय में प्रभु ज्योति का आलोक है पर प्रभु को भक्ति से ही मिला जा सकता है।

38सब जीवों में एक परमेश्वर ही मौजूद है, जिसने स्वयं ही यह सृष्टि-रचना की है॥ १५॥

39श्लोक महला २॥

40अन्धे आदमी के बताए हुए राह पर वही जाता है, जो स्वयं अंधा होता है, अर्थात् मूर्ख ही मूर्ख के मार्ग पर जाता है।

41हे नानक ! नेत्रों वाला अर्थात् ज्ञानी आदमी कभी भी नहीं भटकता।

42जिनके चेहरे पर आँखें नहीं हैं, उन्हें अन्धा नहीं कहा जाता।

43हे नानक ! अंधे तो वही हैं, जिन्हें भगवान ने कुमार्गगामी किया हुआ है॥ १॥

44महला २॥

45ईश्वर ने जिस आदमी को स्वयं अन्धा बना दिया है, वह तभी नेत्रों वाला हो सकता है, यदि वह स्वयं दृष्टिवान बना दे।

46अन्धा आदमी जैसे जानता है, वैसे ही करता रहता है, चाहे सौ बार उसे समझाने का ही प्रयास किया जाए।

47जिसे अपने हृदय में पड़ी वस्तु का ज्ञान नहीं होता समझ लो वह स्वयं ही अज्ञानता पर चल रहा है।

48हे नानक ! कोई ग्राहक उस वस्तु को कैसे ले सकेगा जब वह उसे पहचान ही नहीं सकता॥ २॥

49महला २॥

50उस आदमी को अन्धा क्यों कहा जाए जो ईश्वरेच्छा से अन्धा हुआ है?

51हे नानक ! जो परमात्मा के हुक्म को नहीं समझता, उसे ही अन्धा कहा जाता है॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं