सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 952 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1गुरु-पीर के बिना उसे भी खुदा के घर स्थान नहीं मिलता।

2वहाँ प्रभु के दरबार में जाने का मार्ग तो हर कोई पूछता रहता है परन्तु कोई विरला ही वहाँ जाता है।

3शुभ कर्म के बिना कोई भी स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकता।

4जिस किसी मनुष्य ने योगी के घर जाकर उससे योग की युक्ति पूछी है तो

5उसके मनोरथ के लिए योगी ने उसके कानों में मुद्राएँ डाल दी हैं।

6मनुष्य मुद्राएँ पहनकर संसार में इधर-उधर ही भटकता रहता है

7किन्तु सृजनहार परमेश्वर सर्वव्यापक है ।

8जगत् में जितने भी जीव हैं, वे सभी मुसाफिर हैं।

9जब भी किसी जीव को मृत्यु का निमंत्रण आया है, उसने जाने में कभी कोई देरी नहीं की।

10जिसे इहलोक में भगवान की पहचान हो जाती है, वह परलोक में भी जाकर उसे पहचान लेता है।

11हिन्दू एवं मुसलमान के शुभ कर्म के बिना अन्य सब व्यर्थ है।

12सत्य के दरबार में सब जीवों के कर्मो का हिसाब-किताब होता है और

13शुभ कर्मों के बिना किसी की भी मुक्ति संभव नहीं।

14गुरु नानक कहते हैं कि परमसत्य परमेश्वर का नाम जपने वाले जीव की

15आगे परलोक में कोई पूछताछ नहीं होती ॥ २ ॥

16पउड़ी॥

17यह मानव-शरीर रूपी किला हरि का मन्दिर कहा जाता है।

18इस में लाल एवं जवाहर रूपी शुभ गुण पड़े हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए गुरु के माध्यम से हरि का नाम जपो।

19यह शरीर रूपी हरि का मन्दिर अति सुन्दर है, इसलिए हरि नाम को मन में बसा लो।

20स्वेच्छाचारी जीव स्वयं ही कुमार्गगामी होते हैं और नित्य मोह-माया में फँसकर दुखी होते रहते हैं।

21सबका मालिक एक परमेश्वर ही है, परन्तु उत्तम भाग्य से ही उसे प्राप्त किया जा सकता है॥ ११॥

22श्लोक महला १॥

23दुख भोगने, सुखों में लीन रहने एवं जल में जीवों की तरह डुबकियां लगाने से भी सिद्धि नहीं मिलती।

24सिर के केश मुंडवा लेने एवं विद्या पढ़कर देश-प्रदेश में भटकने से भी सिद्धि नहीं होती।

25पेड़ों, पहाड़ों में रहकर और खुद को आरे से चिरवा कर दुख सहने से भी सिद्धि नहीं होती।

26हाथी को जंजीर से बांधकर एवं गाय को घास चराने से भी सिद्धि नहीं होती।

27जिस परमेश्वर के हाथ में सिद्धि है, यदि वह किसी को सिद्धि प्रदान करे तो ही वह उसे आकर मिलता है, जिसे सिद्धि देता है।

28हे नानक ! यह कीर्ति उसे ही मिलती है, जिसके हदय में ब्रहा-शब्द बस जाता है।

29परमेश्वर का फुरमान है कि सब शरीर मेरे ही बनाए हुए हैं और सबमें मैं ही मौजूद हूँ, जिसे मैं कुमार्गगामी कर देता हूँ, उसे कौन सन्मार्ग बता सकता है।

30जिसे मार्गदर्शन करता है, उसे कौन भुला सकता है?

31जिसे प्रारम्भ से ही रास्ता भुला दिया है, उसे कौन रास्ता दिखा सकता हे ?॥ १॥

32महला १॥

33वही गृहस्थी उत्तम है, जो अपनी इन्द्रियों को नियंत्रण में रखता है।

34वह जप, तप एवं संयम को भिक्षा बना लेता है और

35अपने शरीर को दान-पुण्य करने वाला बना लेता है।

36ऐसा गंगा जल की तरह पावन हो जाता है।

37ईसर कहता है कि परमात्मा सत्यस्वरूप है,

38उस परमतत्व में कोई चक्र-चिन्ह एवं रूप नहीं है॥ २ ॥

39महला १॥

40वही अवधूत है, जो आत्माभिमान को जला देता है।

41वह अपने शारीरिक संताप को भिक्षा भोजन बना लेता है।

42वह अपने हृदय रूपी नगर में जाकर नाम की भिक्षा मांगता है।

43ऐसा अवधूत परमात्मा के चरणों में विलीन हो जाता है।

44गोरख कहता है कि ईश्वर सत्यस्वरूप है,

45उस परमतत्व का कोई रूप अथवा चिन्ह नहीं है॥ ३ ॥

46महला १॥

47वही उदासी साधु भला है जो वैराग्य का पालन करता है।

48वह निरंजन का ध्यान करता रहता है, जिसका निवास पृथ्वी एवं गगन इत्यादि सब लोकों में है।

49जो शिव रूपी चाँद एवं शक्ति रूपी सूर्य का सुमेल करवा देता है

50उस विरक्त की शरीर रूपी दीवार ध्वस्त नहीं होती ।

51गोपीचंद कहता है कि ईश्वर सत्यस्वरूप है,

52वह परमतत्व निराकार है॥ ४ ॥

53महला १॥

54वही जैनी साधु उत्तम है, जो काया की मैल को शुद्ध करता है।

55वह अपनी काया की अग्नि में ब्रह्म को प्रज्वलित करता है और

56स्वप्न में भी अपने वीर्य को बहने नहीं देता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं