सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 950 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji

1जैसे अग्नि में धातु डालने से शुद्ध हो जाती है, वैसे ही प्रभु भय दुर्मति रूपी मैल को मन से निकाल देता है।

2हे नानक ! वही भक्तजन सुन्दर हैं, जो भगवान से रंग लगाकर उसमें लीन हो गए हैं॥ १॥

3महला ३॥

4जब रामकली राग द्वारा गुणगान किया तो राम मेरे मन में बस गया और मेरा सुन्दर श्रृंगार बन गया।

5जब गुरु के शब्द द्वारा हृदय-कमल प्रफुल्लित हो गया तो भगवान ने मुझे भक्ति का भण्डार सौंप दिया।

6जब सारा भ्रम दूर हो गया तो यह मन जाग्रत हो गया और अज्ञान का अंधकार समाप्त हो गया।

7जिस जीव-स्त्री का परमेश्वर से प्रेम होता है, उसे अति सुन्दर रूप चढ़ जाता है और

8वह शोभावान नारी सदा ही अपने प्रेियतम के संग रमण करती है।

9स्वेच्छाचारी जीव-स्त्री श्रृंगार करना नहीं जानती और वह अपना समूचा जीवन हार कर जगत् से चली जाती है।

10जो जीव रूपी नारी भगवान की भक्ति के बिना अन्य श्रृंगार करती है, वह नित्य जन्म-मरण में ख्वार होती है।

11वह संसार में शोभा प्राप्त नहीं करती और आगे परलोक में ईश्वर ही जानता है, क्या व्यवहार किया जाए।

12हे नानक ! एक ईश्वर ही सत्य है और शेष संसार जन्म-मरण दोनों में पड़ा हुआ है।

13परमात्मा ने स्वयं ही जीवों को अच्छे एवं बुरे कार्यों में लगाया हुआ है, इसलिए जीव वही कुछ करते हैं, जो वह उनसे करवाता है॥ २॥

14महला ३॥

15सतगुरु की सेवा किए बिना मन को शान्ति नहीं मिलती और न ही द्वैतभाव दूर होता है।

16यदि हम अधिकतर पाने की कामना करें तो भी भाग्य के बिना प्राप्त नहीं होता।

17जिसके अन्तर्मन में लोभ रूपी विकार है, वह द्वैतभाव में ही ख्यार होता है।

18उसका जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता और वह अभिमान में ही दुखी होता रहता है।

19जिन्होंने अपना चित्त सतगुरु से लगाया है, उनमें से कोई भी देन से खाली नहीं रहता।

20उन्हें न ही यम का निमंत्रण आता है और न ही दुख सहन करना पड़ता है।

21हे नानक ! ऐसे गुरुमुख संसार-सागर से पार हो गए हैं और ये शब्द द्वारा सत्य में ही विलीन हो गए हैं।॥ ३॥

22पउड़ी॥

23अन्य सभी जीव दुनिया के कार्यों में इधर-उधर भागते रहते हैं परन्तु ईश्वर इन कायों से सदा निर्लिप्त रहता है।

24वह निश्चल एवं अटल है किन्तु अन्य जीव आवागमन में पड़े रहते हैं।

25गुरुमुख बनकर सदैव भगवान का ध्यान करना चाहिए, तभी परमसुख प्राप्त होता है।

26ऐसा जीव अपने सच्चे घर में निवास प्राप्त कर लेता है और ईश्वर की स्तुति में ही लीन रहता है।

27वह सच्चा परमेश्वर गहन-गंभीर है और गुरु के शब्द द्वारा ही इस तथ्य की सूझ होती है॥ ८ ॥

28श्लोक महला ३॥

29हे जीव ! सत्य नाम का ध्यान किया कर, चूंकेि समूचे विश्व में सत्य का ही प्रसार है।

30हे नानक ! जो परमात्मा के हुक्म को समझ लेता है, उसे सत्य रूपी फल प्राप्त हो जाता है।

31जो व्यक्ति मुँह से बातें ही करता रहता है और हुक्म को नहीं समझता, उसे सत्य का बोध नहीं होता।

32हे नानक ! जो भगवान की इच्छा को मानता है, वही भक्त होता है और ईश्वरेच्छा को न मानने वाला जीव झूठा एवं कच्चा ही सिद्ध होता है॥ १॥

33महला ३॥

34स्वेच्छाचारी जीव मधुर वाणी बोलना ही नहीं जानते, क्योंकि उनके मन में काम, क्रोध एवं अहंकार भरा होता है।

35उनके अन्तर्मन में लोभ रूपी विकार होता है, जिससे वे अच्छे बुरे को भी नहीं जानते।

36वे अपने स्वार्थ के लिए आकर बैठते और बातें करते हैं और परिणामस्वरूप निर्दयी यम से दण्ड भोगते हैं।

37आगे परलोक में भी उनसे कर्मो का लेखा-जोखा मांगा जाता है तथा अशुभ कर्मों के कारण उन झूठों को पीट-पीट कर ख्वार किया जाता है।

38कोई सोच-विचार कर यह निष्कर्ष निकालो कि उन स्वेच्छाचारी जीवों के मन में से झूठ की मैल कैसे उतर सकती है ?

39जब सतगुरु से भेंट हो जाती है तो वह उनके मन में नाम द्रढ़ करवा देता है, परमात्मा का नाम सब पापों को नाश करने वाला है।

40उस भक्त को सभी प्रणाम करो, जो नित्य नाम जपता और नाम की आराधना करता रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं