सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 94 · Raag Maajh

1रागु माझ चउपदे घरु १ महला ४

2सबका मालिक एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला सर्वशक्तिमान,निर्भय, निर्वेर, अकालमूर्ति, अयोनि एवं स्वयंभू है, जिसकी लब्धि गुरु की कृपा से होती है।

3हरि-परमेश्वर एवं उसका 'हरि-हरि' नाम मुझे मन में अति प्रिय है।

4मेरे सौभाग्य ही हैं कि मैं हरि-नाम का सिमरन करता रहता हूँ।

5हरि-नाम सिमरन की सिद्धि मैंने पूर्ण गुरु से प्राप्त की है; कोई विरला पुरुष ही गुरु की मति पर चलता है॥१॥

6मैंने परलोक में जाने हेतु यात्रा व्यय हेतु हरि-नाम का धन दामन में बांध लिया है।

7हरि-नाम मेरे प्राणों का साथी बन गया है और यह हमेशा ही मेरे साथ रहता है।

8पूर्ण गुरु ने मेरे मन में हरि का नाम बसा दिया है; यह हरि धन सदैव स्थिर रहने वाला है; गुरु ने हरिनाम रूपी धन मेरे दामन में डाल दिया है॥२॥

9हरि-परमेश्वर मेरा सज्जन एवं प्रियतम बादशाह है।

10कोई संत-महापुरुष आकर मुझे हरि से मिला दे, क्योंकि वह मेरे प्राणों का जीवन है।

11हे मेरी माँ ! मैं अपने प्रियतम के दर्शनों बिना रह नहीं सकता, मेरे नेत्रों में से अश्रु बह रहे हैं।॥ ३॥

12सतगुरु मेरा मित्र एवं मेरा बचपन का साथी है।

13हे मेरी माँ ! मैं उसके दर्शनों से वंचित हुआ जीवित नहीं रह सकता।

14हे हरि ! मुझ पर कृपा करो और मुझे गुरु से मिला दो; हे नानक ! गुरु हरि-नाम रूपी धन मेरे दामन में डाल देगा।॥४ ॥१॥

15माझ महला ४ ॥

16हे मधुसूदन ! तू ही मेरा मन, तन एवं प्राण हैं,

17क्योंकि हरि के अलावा मैं किसी अन्य को नहीं जानता।

18भाग्य से यदि कोई सज्जन संत मुझे मिल जाए तो वह मुझे मेरे प्रियतम हरि-प्रभु का मार्गदर्शन करेगा ॥१॥

19मैं अपने मन एवं तन की खोज से उस परमेश्वर को ढूंढ रहा हूँ।

20हे मेरी माँ ! मेरा प्रियतम प्रभु मुझे किस प्रकार मिले?

21संतों की संगति में रहकर मैं उस ईश्वर का पता पूछता हूँ क्योंकि संतों की संगति के बीच हरि-प्रभु का निवास है॥२॥

22हे प्रभु ! मुझे मेरे प्रिय प्रियतम सतिगुरु से मिला दो, जो मेरा रखवाला है।

23मैं एक विवश बालक हूँ, मेरा पालन-पोषण कीजिए।

24पूर्ण सतिगुरु ही मेरे माता-पिता हैं, उनके दर्शन रूपी जल के मिलन से मेरा हृदय रूपी कमल प्रफुल्लित हो जाता है॥ ३॥

25गुरु के दर्शनों के बिना मुझे नींद नहीं आती

26क्योंकि मेरा मन एवं तन गुरु के विरह की पीड़ा सहता है।

27हे हरि प्रभु ! मुझ पर दया कीजिए और मेरा गुरु से मिलन करवा दो, गुरु के मिलन से दास नानक आनंदित हो जाता है॥४॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं