सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 948 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji

1यदि मेरा प्रभु मुझे शांति नहीं देता तो उससे मेरा क्या जोर चल सकता है ?

2(उसकी सखी उसे समझाती है कि) गुरु की कृपा से ईश्वर का ध्यान-मनन हो सकता है और उसे अपने हृदय में बसाकर रखना चाहिए।

3नानक कहते हैं कि जब करतार की कृपा होती है तो घर बैठे ही मालिक को पाया जा सकता है॥ १॥

4महला ३॥

5दुनिया के कार्यों में भागकर ही पूरा दिन बीत गया है और रात सो कर गंवा दी है।

6झूठ बोल कर माया रूपी विष सेवन कर लिया है और अब मनमानी करने वाला जीव रोता पछता कर जगत् से चला गया है।

7सिर पर यम का डण्डा बज रहा है और द्वैतभाव में लगकर सारी प्रतिष्ठा गंवा दी है।

8जिसने प्रभु का नाम कभी याद नहीं किया है, उसे जन्म-मरण का चक्र दोबारा पड़ जाता है।

9गुरु की कृपा से जिसके मन में प्रभु बस जाता है, उसे यम का डण्डा कोई नहीं लगता।

10नानक कहते हैं कि वह सहजावस्था में सत्य से मिला रहता है परन्तु यह सहजावस्था प्रभु-कृपा से ही प्राप्त होती है॥ २॥

11पउड़ी ॥

12परमेश्वर ने किसी को सतगुरु की मत देकर अपनी स्तुति करने में लगाया हुआ है।

13उसने कुछ महापुरुषों को नाम प्रदान करके सत्य में स्थिर किंया हुआ है।

14वायु देवता, वरुण देवता एवं अग्नि देव सभी उसके हुक्म में ही भक्ति करते हैं।

15इन देवताओं की परमात्मा पर पूर्ण निष्ठा है और जगत् की पूर्ण रचना बनी हुई है।

16सब पर परमेश्वर का हुक्म ही कार्यशील है और उसके आदेश का पालन करने से ही सुख उपलब्ध होता है॥ ३॥

17श्लोक ॥

18हे कबीर ! राम की कसौटी ऐसी है कि कोई भी झूठा आदमी उस पर नहीं टिक पाता।

19जो मरजिवा (जीवनमुक्त) होता है, वही राम की कसौटी पर खरा उतरता है॥ १॥

20महला ३॥

21इस मन को कैसे मारा जा सकता है और जीव कैसे लालसाओं की ओर से मृतक हो जाए ?

22कोई भी अभिमान को नहीं छोड़ता और न ही शब्द-गुरु का पालन करता है।

23गुरु की कृपा से जिसका अभिमान छूट जाता है, वही जीवन्मुक्त होता है।

24नानक कहते हैं कि परमात्मा जिस पर अपनी कृपा करता है, उसे ही मुक्ति मिली है और फिर उसे कोई विघ्न नहीं आता॥ २॥

25महला ३॥

26जीवित ही मरने की बातें तो हर कोई करता है परन्तु जीवन-मुक्ति कैसे होती है ?

27यदि जीव परमात्मा के आस्था रूपी भय का संयम धारण करे और प्रेम की औषधि का उपयोग करे और

28नित्य उसका गुणगान करे तो सहज स्वभाव ही सुखपूर्वक नाम द्वारा विष रूपी भवसागर से पार हो जाता है।

29हे नानक ! जिस पर उसकी करुणा-दृष्टि होती है, वह जीवन-मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥

30पउड़ी ॥

31ईश्वर ने द्वैतभाव पैदा किया है और दुनिया भर में त्रिगुणात्मक माया का प्रसार है।

32ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश-ये त्रेिदेव परमात्मा ने ही उत्पन्न किए हैं और वे हुक्म से ही कार्य करते हैं।

33पण्डित एवं ज्योतिषी ग्रंथ पढ़ते रहते हैं परन्तु उन्हें यथार्थ ज्ञान की सूझ नहीं होती।

34हे सच्चे सृजनहार ! यह सारी दुनिया तेरा खेल है।

35जिसे तू चाहता है, उसे मुक्त कर देता है और वह सच्चे शब्द में विलीन हो जाता है॥ ४ ॥

36श्लोक महला ३॥

37मन का झूठा आदमी सदा झूठ का ही कार्य करता है।

38वह स्वयं को तपस्वी कहलाता है किन्तु धन के लिए इधर-उधर घूमता रहता है।

39भ्रम में भूला हुआ वह सभी तीर्थों में रटन करता रहता है,

40किन्तु ऐसा तपस्वी कैसे परमगति प्राप्त कर सकता है ?

41हे नानक ! गुरु के आशीर्वाद से जो सत्य की साधना करता है,

42ऐसा तपस्वी ही मोक्ष प्राप्त करता है॥ १॥

43महला ३॥

44सच्चा तपस्वी वही है जो ऐसा तप करता है की

45सतगुरु से साक्षात्कार कर शब्द-साधना की तपस्या करता है।

46सतगुरु की सेवा रूपी तपस्या ही परमात्मा को मंजूर होती है।

47हे नानक ! ऐसा तपस्वी ही सत्य के दरबार में शोभा प्राप्त करता है। २॥

48पउड़ी॥

49दुनिया का कार्य-व्यवहार करने के लिए परमात्मा ने रात और दिन पैदा किए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं