गुरु ग्रंथ साहिब 947 · Raag Raamkalee
1ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
2रामकली की वार महला ३ ॥
3जोधै वीरै पूरबाणी की धुनी ॥
4श्लोक महला ३॥
5सतगुरु सुख एवं शान्ति का खेत है, प्रभु जिसका प्रेम गुरु से लगा देता है,
6वह नाम ही बोता है, उसका बोया हुआ नाम ही पैदा होता है और फिर वह नाम में ही विलीन रहता है।
7जीव का अहम् ही उसके जन्म-मरण का बीज है, पर नाम बोने से उसका जन्म-मरण का भय दूर हो गया है।
8वह नाम के बिना न कुछ अन्य बोता है और न कुछ पैदा होता है। अब वह वही कुछ खाता है, जो परमात्मा देता है।
9गुरुमुख जल में जल की तरह मिला परमेश्वर से दुबारा अलग नहीं होता।
10नानक कहते हैं कि है लोगो ! आकर देख लो,
11गुरुमुख की यही जीवन लीला है किन्तु ये लोग बेचारे क्या देखें, जिन्हें इस बात की कोई सूझ ही नहीं है।
12जिसके मन में भगवान बस गया है, वही देखता है, जिसे वह स्वयं दिखाता है॥ १॥
13महला ३॥
14स्वेच्छाचारी जीव दुख का खेत है, वह दुख बोता है और दुख ही भोगता है।
15वह दुख में जन्म लेता है, दुख में ही प्राण त्याग देता है, उसकी पूरी जिंदगी अहंकार करते ही व्यतीत हो जाती है।
16उसे जन्म-मरण की कोई सूझ नहीं, वह ज्ञानहीन होने के कारण ज्ञानहीन कर्म ही करता है।
17जो परमेश्वर उसे जीवन के सुख देता है, उसे वह जानता ही नहीं अपितु उसकी दी हुई चीजों में ही लिपटा रहता है।
18हे नानक ! जो पूर्व ही मनुष्य की किस्मत में लिखा होता है, वही उसे करना पड़ता है और किस्मत के बिना अन्य कुछ भी नहीं किया जा सकता ॥ २॥
19महला ३॥
20जिस व्यक्ति को ईश्वर (गुरु से) मिला देता है, वह सतगुरु से मिलकर सदा ही सुख प्राप्त करता है।
21यह विवेक ही सुरध का कारण है, जिससे मन निर्मल हो जाता है।
22उसके अज्ञान का भ्रम निवृत्त हो जाता है और ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
23हे नानक ! उस मनुष्य को हर तरफ एक परमेश्वर ही नजर आया है, वह जिधर भी देखता है, उधर ही वह मौजूद है॥ ३॥
24पउड़ी॥
25सच्चे परमेश्वर ने यह जगत् रूपी सिंहासन अपने बैठने के लिए स्थान बनाया है।
26वह स्वयं ही सब कुछ करने वाला है, यह बात गुरु के शब्द ने सुनाई है।
27उसने स्वयं ही अपनी कुदरत बनाई है और बहुत सारे महल एवं सराय बनाई है।
28उसने दुनिया में आलोक करने के लिए चाँद एवं सूर्य रूपी दो दीपक बनाकर पूरी रचना बनाई है।
29वह स्वयं ही सब देखता एवं सुनता है और गुरु के शब्द द्वारा ही उसका ध्यान किया जाता है॥ १॥
30वाह सच्चे पातशाह ! वाह वाह !! तू प्रशंसनीय है, तेरा नाम शाश्वत है॥ १॥ रहाउ॥
31श्लोक ॥
32कबीर जी कहते हैं कि हे मेरे मालिक ! मैंने स्वयं को पीस-पीस कर मेहंदी बनाकर रखा हुआ है,
33पर तूने कभी मेरी बात नहीं पूछी और न ही तूने इस मेहंदी को अपने चरणों से लगाया है ॥ १॥
34महला ३॥
35नानक कहते हैं कि मैंने खुद को मेहंदी बनाकर रखा हुआ है ताकि मालिक मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि करे।
36वह स्वयं ही मेहंदी को पीसता है, स्वयं ही इसे घीसता है और स्वयं ही चरणों से लगा लेता है।
37यह प्रेम का प्याला मालिक-प्रभु का अपना है, जिसे वह चाहता है, उसे ही यह पीने के लिए देता है॥ २ ॥
38पउड़ी॥
39परमेश्वर ने अनेक प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की है, उसके हुक्म से जीव जन्मते एवं मरते हैं और (सृष्टि का प्रलय होने पर) सत्य में ही विलीन हो जाते हैं।
40हे परमेश्वर ! तू स्वयं ही अपनी सृष्टि को देखकर प्रसन्न होता है और तेरे जैसा अन्य कोई नहीं।
41जैसे तुझे मंजूर होता है, वैसे ही तू जीवों को रखता है और गुरु के शब्द द्वारा ही तू ज्ञान प्रदान करता है।
42सब जीवों पर तेरा ही बल चलता है, जैसे तुझे उपयुक्त लगता है, वैसे ही तू चलाता है।
43मुझे तेरे जैसा महान् अन्य कोई नजर नहीं आता, मैं यह बात किंसे कहकर सुनाऊँ ?॥ २ ॥
44श्लोक महला ३॥
45हे सखी ! भ्रम में पड़कर भूली हुई मैं सारे जगत् में घूमती रही हूँ और अपने प्रिय-प्रभु को ढूंढती हुई बावली हो गई हूँ।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं