सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 945 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1(गुरु जी उत्तर देते हैं कि) हे अवधूत ! शब्द के बिना रस प्राप्त नहीं होता और अभिमान के कारण लालसा दूर नहीं होती।

2शब्द में लीन हुए जीव को ही हरि-नामामृत रस प्राप्त होता है और सत्य से तृप्त हो जाता है।

3(सिद्धों ने प्रश्न किया-) वह कौन-सी बुद्धि है, जिससे मन स्थिर रहता है और यह किस भोजन से तृप्त हो जाता है।

4गुरु नानक कहते हैं कि सतगुरु से दीक्षा लेने से ही जीव को दुख-सुख एक समान मालूम होता है और फिर उसे काल भी ग्रास नहीं बनाता ॥ ६१॥

5जो व्यक्ति प्रभु के रंग में लीन नहीं हुआ, वह इस रस में कभी मस्त नहीं हुआ।

6शब्द-गुरु के बिना वह क्रोध की अग्नि में ही जलता रहता है।

7जिसने अपना वीर्य संभाल कर नहीं रखा, उसने कभी अपने मुख से शब्द का जाप नहीं किया,

8उसने प्राणायाम द्वारा प्राणों को वश में नहीं किया और न ही भगवान की आराधना की है।

9नानक कहते हैं कि यदि मनुष्य अकथनीय प्रभु की कथा करके दुख-सुख को एक समान समझ कर जीवन व्यतीत करे

10तो वह आत्मा में ही परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥

11गुरु की कृपा से ही मनुष्य प्रभु के रंग में रंगा रहता है।

12जिसने नामामृत का पान कर लिया है, वह सत्य में ही मग्न रहता है।

13गुरु की वाणी का विचार करने वाले मनुष्य ने अपनी तृष्णाग्नि बुझा ली है।

14जिसने नामामृत का पान किया है, उसे ही सच्चा सुख उपलव्ध हुआ है।

15गुरु के माध्यम से भगवान की आराधना करने से जीव भवसागर से तैर जाता है।

16हे नानक ! इस रहस्य को कोई विचारवान् ही समझता है। ॥६३॥

17(सिद्धों ने पुनः प्रश्न किया-) मस्त हाथी सरीखा यह मन कहाँ रहता है, और यह पवन रूपी प्राण कहाँ निवास करते हैं?

18हे अवधूत ! यह शब्द कहाँ वास करता है, जिसका जाप करने से मन की भटकन मिट जाती है।

19गुरु नानक उत्तर देते हैं केि जब प्रभु कृपा करता है तो वह जीव को सतगुरु से मिला देता है और फिर उसका यह मन अपने सच्चे घर में निवास प्राप्त कर लेता है।

20जब यह अपने अहम् को समाप्त कर देता है तो यह निर्मल हो जाता है और फिर वह अपनी भटकन पर अंकुश लगा देता है।

21(सिद्धों ने फिर पूछा-) यह मन अपने मूल (परमात्मा) को कैसे पहचाने और आत्मा को कैसे जाने ? (गुरु रूपी) चन्द्रमा के घर में (शक्ति रूपी) सूर्य कैसे समा सकता है ?

22गुरु नानक देव जी उत्तर देते हैं कि जब गुरु के निर्देशानुसार अपने अन्तर्मन में से अहंकार को नष्ट कर देता है तो वह सहज ही विलीन हो जाता है। ॥६४॥

23यह मन निश्चल हृदय में निवास करता है और गुरुमुख बनकर अपने मूल को पहचान लेता है।

24पवन रूपी प्राण अपने नाभि रूपी घर में आसन पर विराजमान होता है तथा गुरु की अनुकंपा से खोज करके परम तत्व को प्राप्त कर लेता है।

25वह शब्द अपने दसम द्वार रूपी सच्चे घर में ही निरंतर निवास करता है और शब्द द्वारा परमात्मा को ढूंढ लेता है, जिसकी ज्योति तीनों लोकों में फैली हुई है।

26जब मन को सत्य की भूख लगती है तो वह भूख उसके दुखों को निगल जाती है और फिर यह मन सत्य से ही तृप्त रहता है।

27गुरुमुख ने ही अनाहत वाणी को जान लिया है और विरले ने ही अर्थ को समझा है।

28गुरु नानक कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्य का उच्चारण करता है, वह सत्य में ही रंग जाता है और फिर यह रंग कभी नहीं उतरता ॥ ६५ ॥

29(सिद्धों ने फिर पूछा-) जब यह हृदय एवं शरीर नहीं होता था तो यह मन कहीं रहता था ?

30जब यह नाभि कमल रूपी स्तंभ नहीं होता था तो पवन रूपी प्राण केिस घर में सहारा लेता था ?

31जब इस सृष्टि का कोई रूप-रंग एवं आकार नहीं था तो शब्द द्वारा कहाँ ध्यान लगाया जाता था ?

32जब माता के रक्त एवं पिता के वीर्य से बना हुआ यह शरीर नहीं था तो ईश्वर की गति की कीमत कैसे प्राप्त होती थी ?

33जब कोई रंग, वेष एवं रूप ही नहीं मालूम होता था तो सत्य का बोध क्योंकर होता था ?

34नानक कहते हैं कि प्रभु नाम में लीन रहने वाले ही सच्चे वैरागी हैं और उन्हें भूतकाल, वर्तमान काल एवं भविष्य में परम सत्य ही दिखाई देता है॥ ६६ ॥

35(गुरु जी ने उत्तर देते हुए समझाया कि) हे अवधूत ! जब यह हृदय एवं शरीर नहीं था तो यह वैरागी मन शब्द में ही लीन रहता था।

36जब नाभि कमल रूपी स्तंभ नहीं होता था तो यह सत्य का प्रेमी पवन रूपी प्राण अपने सच्चे घर में निवास करता था।

37जब सृष्टि का कोई रूप-रंग एवं आकार नहीं था तो वह शब्द परमात्मा में लीन रहता था।

38जब आवागमन एवं गगन भी नहीं था तो निरंकार की ज्योति तीनों लोकों में मौजूद थी।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं