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गुरु ग्रंथ साहिब 944 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1हे नानक ! जिसके मन में अनहद शब्द रूपी गुप्त वाणी प्रगट हो जाती हैं,

2वह सत्य की पहचान कर लेता है॥ ५३ ॥

3सहज स्वभाव परमात्मा को मिलने से ही सुख उपलब्ध होता है।

4गुरुमुख सदा ही जागृत रहता है और वह अज्ञान की निद्रा में नहीं सोता।

5अनहद शब्द को अपरंपार प्रभु ही उत्पन्न करता है।

6नाम-सिमरन करने वाले की मुक्ति हो जाती है और शब्द द्वारा अन्यों का भी कल्याण हो जाता है।

7गुरु से दीक्षा लेने वाला सत्य में ही विलीन रहता है।

8हे नानक ! अहंत्व को दूर करने से ही सत्य से मिलाप होता है किन्तु भ्रम में फँसने से मिलाप नहीं होता ॥ ५४॥

9[सिद्धों ने फिर से प्रश्न किया-} वह कौन-सा ठिकाना है, जहाँ रहकर मनमुख अपनी खोटी बुद्धि को नाश कर देता है?

10वह यम से चोटें खाता रहता है और परमतत्व को क्यों नहीं बूझता ?

11(गुरु जी उत्तर देते हैं कि) यम के द्वार पर बंधे हुए जीव की कोई भी रक्षा नहीं करता और

12शब्द के बिना कोई भी उसकी इज्जत एवं उस पर भरोसा नहीं करता।

13वह सत्य को कैसे पहचान सकता है और कैसे भवसागर से पार हो सकता है।

14हे नानक ! मूर्ख मनमुख को कभी ज्ञान नहीं होता॥ ५५॥

15{गुरु जी उत्तर देते हैं-} गुरु-शब्द का चिंतन करने से खोटी बुद्धि का नाश हो जाता है।

16सतगुरु से साक्षात्कार होने से मोक्ष द्वार मिल जाता है।

17मनमुख परमतत्व की पहचान नहीं करता इसलिए जलकर राख हो जाता है।

18जीव अपनी दुर्मति के कारण सत्य से बिछुड़ कर यम का दुख भोगता रहता है।

19परमात्मा के हुक्म का पालन करने वाला सभी गुणों एवं ज्ञान को हासिल कर लेता है।

20हे नानक ! वही मनुष्य दरबार में सम्मान प्राप्त करता है॥ ५६॥

21जिसके पास सत्य रूपी धन राशि होती है,

22वह स्वयं तो भवसागर से पार होता ही है, अपने संगियों का भी उद्धार करवा देता है।

23जो सहज ही सत्य में लीन रहता है, वह सत्य को बूझकर शोभा का पात्र बन जाता है।

24ऐसे व्यक्ति की सही कीमत कोई नहीं कर सकता।

25वह जिधर भी देखता है, उसे भगवान ही दिखाई देता है।

26हे नानक ! सत्य में श्रद्धा भावना रखने से जीव का कल्याण हो जाता है।॥ ५७ ॥

27(सिद्धों ने पुनः पूछा-) उस शब्द का निवास कहाँ पर है, जिस द्वारा संसार रूपी भवजल से उद्धार होता है?

28दस अंगुल बाहर आने वाले प्राण-वायु का वास्तव में क्या आधार है?

29जो सत्ता बोलती एवं खेलती रहती है, वह कैसे स्थिर हो सकती है ? और क्योंकर परमात्मा के दर्शन कर सकती है?

30गुरु जी ने उत्तर दिया-हे स्वामी ! जरा ध्यान से सुनो; नानक सच्ची प्रार्थना करता है कि मन को समझाने से ही स्थिर किया जा सकता है।

31जब गुरुमुख बनकर शब्द द्वारा सत्य में ध्यान लग जाता है तो ईश्वर अपनी करुणा-दृष्टि से साथ मिला लेता है।

32परमात्मा स्वयं ही चतुर एवं सर्वज्ञाता है और पूर्ण भाग्य से ही जीव उसमें विलीन होता है॥ ५८ ॥

33उस शब्द का निरंतर सब में निवास है, वह अदृष्ट है, फिर भी जिधर भी देखो, वही समाया हुआ है।

34जैसे पवन हर जगह फैली हुई है, वैसे ही शब्द का निवास है। वह निर्गुण भी है और सगुण भी है।

35जब परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि करता है तो हृदय में शब्द का निवास हो जाता है और मन का भ्रम दूर हो जाता है।

36जो निर्मल वाणी द्वारा नाम को मन में बसा लेता है, उसका तन-मन निर्मल हो जाता है।

37जो व्यक्ति शब्द-गुरु द्वारा संसार-सागर से पार हो जाता है, वह लोक-परलोक में व्यापक ईश्वर को जान लेता है।

38हे नानक ! यह माया जिस परमात्मा की छाया है, उसका कोई चिन्ह एवं वर्ण नहीं। जीव फिर शब्द की पहचान कर लेता है॥ ५६ ॥

39हे अवधूत ! दस अंगुल के प्रमाण वाले प्राणवायु का मुख्याधार परम-सत्य का चिंतन है।

40गुरुमुख नाम जपता एवं परम-तत्व को विलोता रहता है और अलख अपार को पहचान लेता है।

41यह माया के तीनो गुणों को मिटाकर शब्द को बसा लेता है जिससे उसके मन का अहंकार दूर हो जाता है।

42यदि वह अन्तर एवं बाहर ईश्वर की सत्ता को समझ ले तो ही उसका हरि-नाम से प्रेम होता है।

43जब परमात्मा स्वयं ही दर्शन देता है तो गुरुमुख इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ियों द्वारा हासिल होने वाले ज्ञान को बूझ लेता है।

44हे नानक ! सच्चा परमेश्वर इन तीनों नाड़ियों से सर्वोच्च है और शब्द द्वारा ही उसमें लीन हुआ जा सकता है॥ ६० ॥

45(सिद्धों ने पुनः पूछा-) मन का (जीवन) प्राण वायु कहा जाता है किन्तु यह (प्राण) वायु कहीं से आहार प्राप्त करता है ?

46ज्ञान प्राप्त करने की मुद्राएँ अर्थात् साधन कौन-से हैं और कौन-सी साधना द्वारा जीव सिद्ध बन जाता है ?

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं