गुरु ग्रंथ साहिब 942 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1अपने हृदय में भलीभांति विचार करके देख लो, ब्रह्म-शब्द के बिना लोग द्वैतभाव में ही लगे हुए हैं।
2हे नानक ! वही मनुष्य बड़े और भाग्यवान हैं, जिन्होंने अपने हृदय में सत्य को बसाकर रखा हुआ है॥ ३४॥
3गुरुमुख की नाम-रत्न में ही लगन लगी रहती है और
4सहज-स्वभाव ही नाम-रत्न की परख कर लेता है।
5वह नाम-सिमरन का ही सच्चा कार्य करता रहता है और
6उसका मन सत्य में ही विश्वस्त हो जाता है।
7गुरुमुख अन्यों को भी अलख प्रभु के दर्शन करवा देता है और यही उसे अच्छा लगता है।
8हे नानक ! गुरुमुख यम की चोट नहीं खाता॥ ३५ ॥
9गुरुमुख नाम जपता है, शरीर की शुद्धता के लिए स्नान करता और गरीबों को दान देता है।
10उसका सहज ही ईश्वर में ध्यान लगा रहता है और
11उसे सत्य के दरबार में सम्मान प्राप्त हो जाता है।
12हे नानक ! गुरुमुख भयनाशक परमेश्वर का चिंतन करके प्रमुख बन जाता है।
13वह अन्यों से भी नाम-दान का शुभ कर्म करवाता है।
14नानक कहते हैं कि गुरुमुख अपने संगियों को भी ईश्वर से मिला देता है॥ ३६ ॥
15गुरुमुख शास्त्रों, स्मृतियों एवं वेदों का ज्ञाता होता है और
16वह घट-घट में व्याप्त ईश्वर के रहस्य को जान लेता है।
17वह मन में से वैर-विरोध की भावना को दूर कर देता है और
18सब हिसाब मिटा देता है।
19वह राम नाम के रंग में ही लीन रहता है।
20हे नानक ! गुरुमुख ने मालिक-प्रभु को पहचान लिया है॥ ३७ ॥
21गुरु के बिना जीव भ्रम में पड़कर जन्म-मरण में फँसा रहता है और
22गुरु के बिना कोई भी कार्य सफल नहीं होता।
23गुरु के बिना जीव का मन बहुत डगमगाता रहता है और
24गुरु बिना मन को तृप्ति नहीं होती और वह माया रूपी विष ही सेवन करता रहता है।
25गुरु के बिना माया रूपी सर्प जीव को डंस लेता है और वह जीवन रूपी पंथ में ही प्राण त्याग देता है।
26हे नानक ! गुरु के बिना मनुष्य को अपने जीवन में घाटा ही घाटा होता है॥ ३८ ॥
27जिस व्यक्ति को गुरु मिल जाता है, वह उसे संसार-सागर से पार उतार देता है।
28वह उसके अवगुण मिटाकर उसे गुण प्रदान कर देता है।
29गुरु-शब्द का चिंतन करने से मुक्ति एवं परम सुख प्राप्त हो जाता है।
30गुरुमुख जीव जीवन में कभी पराजित नहीं होता।
31मनुष्य का यह तन एक दुकान है और इसमें मन एक व्यापारी बैठा है।
32नानक कहते हैं कि यह मन सहज ही सत्य का व्यापार करता रहता है॥ ३९ ॥
33विधाता ने गुरुमुखों के लिए समुद्र पर सेतु बांध दिया था।
34इस प्रकार रावण की लंका को लूट लिया और दैत्यों का संहार हुआ।
35तब रामचन्द्र जी ने लंकापति रावण का वध कर दिया
36जब विभीषण ने रावण का भेद बताया ।
37गुरु ने पत्थरों को भी समुद्र से तार दिया है और
38तेतीस करोड़ देवताओं का भी उद्धार कर दिया है॥ ४० ॥
39गुरुमुख का जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है और
40उसे भगवान के दरबार में शोभा प्राप्त हो जाती हे।
41उसे बुरे-भले की पहचान हो जाती है और
42सहज ही उसका परम-सत्य में ध्यान लगा रहता है।
43वह सत्य के दरबार में जाकर परमात्मा की स्तुति में ही लीन रहता है।
44नानक कहते हैं कि गुरुमुख को कोई बन्धन नहीं पड़ता॥ ४१॥
45गुरुमुख को निरंजन नाम प्राप्त हो जाता है और
46वह शब्द द्वारा अहंत्व को जला देता है।
47वह सच्चे परमेश्वर का ही गुणगान करता है और
48सत्य में ही लीन रहता है।
49वह परमात्मा का नाम जपता रहता है और उसकी प्रतिष्ठा उत्तम हो जाती है।
50नानक कहते हैं कि गुरुमुख को समूचे विश्व की सूझ हो जाती है।॥ ४२ ॥
51(सिद्धों ने एक बार फिर गुरु नानक देव जी से पूछा-) सृष्टि का मूल क्या है? यह मानव-जीवन कौन-सा उपदेश लेने का समय है ?
52तेरा गुरु कौन है, जिसका तू चेला है?
53कौन-सी कथा लेकर तू दुनिया से निर्लिप्त रहता है ?
54हे बालक नानक ! जो हम बोल रहे हैं तुम ध्यान से सुनो।
55हमें इस कथा का भी अपना विचार बताओ केि
56शब्द संसार-सागर से पार करवाने वाला है ?॥ ४३ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं