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गुरु ग्रंथ साहिब 941 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1इस भेद को वही बुझता है, जिसे परमात्मा स्वयं ज्ञान देता है और गुरु के शब्द द्वारा ही जीव मुक्त हुआ है।

2नानक कहते हैं कि जिसने अपने अभिमान एवं द्वैतभाव को त्याग दिया हैं, तारनहार परमेश्वर ने स्वयं ही उसका उद्धार कर दिया है॥ २५ ॥

3मनमुखी जीव भूलकर यम का मोहताज बना रहता है।

4वह पराई नारी की ओर देखता है, जिस कारण उसे सिर्फ नुक्सान ही उठाना पड़ता है।

5स्वेछाचारी जीव भ्रम में जादू-टोने के चक्कर में भटकते रहते हैं।

6ऐसे वाममार्ग वाले मनुष्य तुटे जा रहे हैं और श्मशान में मंत्र पढ़कर भूतों-प्रेतों की ही पूजा करते हैं।

7वह शब्द की पहचान नहीं करते और अशिष्ट भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं।

8हे नानक ! जो व्यक्ति सत्य में लीन रहते हैं, उन्हें ही सुख उपलब्ध होता है॥ २६॥

9(गुरु नानक देव जी सिद्धों को गुरुमुख के गुण बताते हुए कहते हैं कि) गुरुमुख जीव अपने मन में सच्चे परमात्मा का भय बनाकर रखता है और

10गुरु की वाणी द्वारा असाध्य मन को वशीभूत कर लेता है।

11वह निर्मल भावना से परमात्मा का गुणगान करता है और

12पवित्र परमपद को प्राप्त कर लेता है।

13वह अपने रोम-रोम से ईश्वर का ध्यान करता रहता है।

14हे नानक ! इस प्रकार गुरुमुख परम-सत्य में ही विलीन हो जाता है॥ २७॥

15गुरुमुख सत्य में ही लीन रहता है और वह वेदों का ज्ञाता बन जाता है।

16वह ईश्वर में लीन रहकर भवसागर से पार हो जाता है और

17सत्य में लीन रहकर शब्द का ज्ञाता बन जाता है।

18वह सत्य में प्रवृत्त रहकर मन की विधि को जान लेता है।

19वह अलख-अपार परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

20हे नानक ! गुरुमुख को मुक्ति का द्वार प्राप्त हो जाता है।॥ २८ ॥

21गुरुमुख विचार कर अकथनीय सत्य का ही कथन करता है और

22परिवार में रहते हुए ही उसकी परमात्मा से प्रीति अंत तक निभ जाती है।

23वह अपने मन में श्रद्धा-प्रेम से प्रभु का ही जाप करता रहता है और

24शब्द द्वारा शुभ-आचरण बनाकर ब्रह्मा को प्राप्त कर लेता है।

25शब्द के भेद को जानने वाला गुरुमुख सत्य को जान लेता है और दूसरों को भी इसका ज्ञान देता है।

26हे नानक ! वह अपने अहम् को जलाकर सत्य में ही विलीन हो जाता है॥ २६ ॥

27(गुरु जी सिद्धों को बताते हैं कि) गुरुमुख के लिए परमात्मा ने यह धरती बनाई है।

28उसने इस धरती में जीवों की उत्पति एवं प्रलय की अपनी एक लीला रची हुई है।

29जो जीव गुरु के शब्द में लीन होकर परमात्मा का रंग लगा लेता है,

30वह सत्य में रत होकर शोभा सहित अपने घर पहुँचता है।

31सच्चे शब्द के बिना कोई भी सत्य के दरबार में सम्मान का पात्र नहीं बनता।

32हे नानक ! नाम के बिना जीव कैसे सत्य में विलीन हो सकता है॥ ३० ॥

33गुरुमुख को सुमति एवं आठ सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है।

34वह सत्य का ज्ञान होने के कारण भवसागर को पार कर लेता है।

35वह शुभ एवं अशुभ कर्म की विधि को जान लेता है और

36अंतर्मुखी ज्ञान एवं बहिर्मुखी कर्म होने के मार्ग को पहचान लेता है।

37वह अपने संगियों को संसार-सागर से पार करवा देता है।

38हे नानक ! गुरुमुख शब्द द्वारा ही उनका निस्तार करवाता है॥ ३१॥

39(गुरु जी उपदेश देते हैं कि) परमात्मा के नाम में लीन होने से आत्माभिमान दूर हो जाता है।

40नाम में प्रवृत्त रहने वाला जीव सत्य में ही समाया रहता है।

41हरि-नाम में रत रहने वाले को योग-युक्ति का ज्ञान हो जाता है।

42प्रभु-नाम में लीन रहने वाला जीव मोक्ष-द्वार प्राप्त कर लेता है और

43नाम में लीन रहने से तीनों लोकों का ज्ञान हो जाता है।

44हे नानक ! नाम में लीन रहने से सदा सुख प्राप्त होता है॥ ३२॥

45ईश्वर के नाम में लीन रहने से ही सिद्ध गोष्ठी सफल हो जाती है।

46नाम में प्रवृत्त रहने से ही तपस्या हो जाती है।

47नाम में लीन रहना ही सच्ची करनी है और

48नाम में रत रहना ही परमात्मा के गुणों और ज्ञान का विचारं है।

49नाम के बिना बोलना सब बेकार है।

50हे नानक ! नाम में लीन रहने वाले महापुरुषों को उनका प्रणाम है॥ ३३॥

51पूर्ण गुरु से ही नाम प्राप्त होता है और

52सत्य में लीन रहना ही योग की सच्ची युक्ति है।

53योगी अपने बारह सम्प्रदायों में भटकते रहते हैं और सन्यासी अपने दस सम्प्रदायों में भटकते रहते हैं।

54जो व्यक्ति गुरु के शब्द द्वारा जीवन्मुक्त हो जाता है, उसे मोक्ष द्वार प्राप्त हो जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं