सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 940 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1तूने किस विधि द्वारा अपनी आशा एवं अभिलाषाओं को समाप्त कर लिया है और

2किस विधि द्वारा परम-ज्योति प्राप्त कर ली है?

3दाँतों के बिना अहंत्व रूपी लोहा कैसे चबाया जा सकता है ?

4हे नानक ! इस बारे में सच्चा विचार करो ॥१९॥

5(गुरु नानक देव जी उत्तर देते हैं कि) जब मैंने सतगुरु का आश्रय लेकर जीवन बदल लिया तो उसने मेरा आवागमन ही मिटा दिया।

6मेरा मन अनाहत शब्द में ही प्रवृत्त रहता है और

7ब्रह्म-शब्द द्वारा आशा-अभिलाषा को जला दिया है।

8मैंने गुरुमुख बनकर निरंतर प्रज्वलित परम-ज्योति प्राप्त कर ली है।

9जो माया के तीन गुणों को अपने मन से मिटा देता है, वही अहंत्व रूपी लोहे को चबाता है।

10हे नानक ! तारनहार परमेश्वर स्वयं ही भवसागर से पार करा देता है॥ २० ॥

11(सिद्धों ने पुनः पूछा-) सृष्टि-रचना के संबंध में आपका क्या विचार है और यह भी बताइए कि शून्य रूप में परम-सत्य का कहाँ वास था ?

12ज्ञान की मुद्रा के बारे में आप क्या कहते हैं और घट-घट में किसका निवास है ?

13काल की चोट से कैसे बचा जा सकता है? और निर्भय होकर सच्चे घर में कैसे जाया जाए ?

14सहज संतोष का आसन कैसे जान लिया जाए और कामादिक चैरियों का नाश कैसे किया जा सकता है ?

15(गुरु नानक देव जी उत्तर देते हैं कि) जो व्यक्ति गुरु के शब्द द्वारा अहम् रूपी विष को समाप्त कर देता है, उसका सच्चे घर में निवास हो जाता है।

16जिसने यह सृष्टि रचना की है, जो उसे शब्द द्वारा पहचान लेता है, नानक तो उसका दास है॥ २१॥

17(सिद्धों ने पुनः प्रश्न किया कि) यह जीव कहाँ से आता है और कहीं चला जाता है ? आने से पूर्व एवं जाने के बाद यह कहाँ समाया रहता है ?

18जो इस शब्द के अर्थ समझा देता है, उस गुरु को तिल मात्र भी लोभ नहीं है।

19जीव कैसे परम तत्व परमात्मा को प्राप्त करे और गुरु के माध्यम से उसका किस तरह सत्य से प्रेम हो ?

20हे नानक ! उस परमेश्वर के बारे में अपना विचार बताओ, जो स्वयं ही जीवों को पैदा करने वाला है और स्वयं ही दुख-सुख सुनने वाला है।

21(गुरु नानक उत्तर देते हैं कि) जीव परमात्मा के हुक्म से जन्म लेता है, उसके हुक्म से ही चला जाता है और उसके हुक्म से ही सत्य में समाया रहता है।

22जीव पूर्ण गुरु द्वारा ही सत्कर्म करता है और शब्द से ही सत्य की गति को समझा लेता है॥ २३ ॥

23(पिछले पूछे प्रश्नों के उत्तर देते हुए गुरु जी सिद्धों को बताते हैं कि) सृष्टि-रचना के बारे में मेरा विचार यह है कि उसे अद्भुत ही कहा जा सकता है। ईश्वर ने निरन्तर शून्यावस्था में निवास किया हुआ था।

24गुरु का ज्ञान ही निर्विकल्प मुद्रा है, जिसका विचार करने से यह पता लगता है कि सब जीवों का सच्चा परमेश्वर घट-घट में व्याप्त है।

25जब जीव गुरु के वचनों द्वारा प्रभु में लीन हो जाता है तो वह सहज ही परमतत्व निरंजन को पा लेता है।

26नानक कहते हैं किं जो शिष्य गुरु की सेवा करता है, वह खोज करके सत्य को प्राप्त कर लेता है और उसे अन्य कार्य नहीं करना चाहिए।

27परमात्मा का हुक्म विस्मय है, जो उसके हुक्म को पहचान लेता है, वह इस युक्ति द्वारा उस सत्य को जान लेता है।

28वही सच्चा योगी कहा जाता है, जो अपने अहम् को मिटाकर दुनिया से निर्लिप्त हो जाता है और उसके अन्तर्मन में सत्य का निवास हो जाता है। ॥२३॥

29(गुरु नानक देव जी सिद्धों को समझाते हैं कि ) निर्मल परमात्मा अविगत रूप से पैदा हुआ है और वह अपने निर्गुण रूप से सगुण स्वरूप हो गया।

30यदि जीव का मन सतगुरु में लीन रहे तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है और वह सच्चे-शब्द में ही विलीन हो जाता है।

31वह उस एक सत्य को जानता है और अपना अहम् एवं द्वैतभाव को दूर कर देता है।

32जो शब्द-गुरु को पहचान लेता है, वही सच्चा योगी है और उसके हृदय-कमल में परम-ज्योति का प्रकाश हो जाता है।

33यदि जीव अपने अहंत्व को समाप्त कर दे तो उसे सबकुछ सूझ जाता है और अन्तर्मन में सब पर दया करने वाले ईश्वर को जान लेता है।

34नानक कहते हैं कि जो सब जीवों में बसने वाले परमात्मा को पहचान लेता है, उसे ही कीर्ति प्राप्त होती है।॥ २४ ॥

35(गुरु जी बताते हैं कि) जीव परम सत्य से उत्पन्न होता है और सत्य में ही विलीन हो जाता है और सत्य से मिलकर पावन होकर उसका ही रूप बन जाता है।

36झूठे जीव जन्म लेकर आते हैं किन्तु द्वैतभाव के कारण उन्हें कोई सुख का स्थान नहीं मिलता और आवागमन का चक्र ही पड़ा रहता है।

37उनका आवागमन का चक्र गुरु के शब्द द्वारा ही मिटता है। ईश्वर स्वयं ही अच्छे बुरे जीवों की परख करता है और स्वयं ही उन्हें क्षमा कर देता है।

38द्वैतभाव के कारण सब जीवों को एक ही वेदना लगी हुई है कि उन्हें नाम-रसायन भूल गया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं