सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 93 · Siree Raag

1श्री राग बाणी भगत बेणी जीउ की ॥

2(प्रस्तुत पद को पहरे वाणी के स्वर में गाने का आदेश दिया गया है।)

3ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

4हे मानव ! जब तुम मातृ-गर्भ में थे तो सिर के बल खड़े होकर ईश्वर के स्मरण में लीन थे।

5उस समय तुझे पार्थिव देहि की गरिमा का अहंकार नहीं था और अज्ञानी एवं पूर्ण विहीन होने के कारण तुम दिन-रात एक हरि की आराधना करते थे।

6कष्ट एवं दुखों के वह दिन स्मरण कर, अब तुमने अपने मन के जाल को अत्याधिक फैला लिया है।

7जब से गर्भ को त्याग कर तू इस नश्वर संसार में आया है, तब से तूने हे मानव ! ईश्वर को अपने मन से विस्मृत कर दिया ॥१॥

8हे मूर्ख ! तुम्हें फिर पछताना पड़ेगा, क्यों भ्रम में पड़कर तुम कुमति कर रहे हो।

9राम का चिन्तन कर, अन्यथा यमपुरी जाओगे, हे मानव ! मूखों की भाँति क्यों भटकते फिरते हो?॥१॥ रहाउ॥

10तू अपने बचपन में मनपसंद क्रीड़ाओं-विनोद के स्वाद में लीन रहा है, तुझे क्षण-क्षण उनका मोह उलझा रहा था।

11अब युवावस्था में तू विष रूप माया के रसों को पवित्र समझ कर भोग रहा है; इसलिए काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार पांचों विकार तुझे दुखी कर रहे हैं।

12तूने जप, तप, संयम एवं शुभ कर्मों वाली बुद्धि छोड़ दी है; तू राम नाम की आराधना भी नहीं करता।

13तेरे अन्तर्मन में कामवासना का वेग तरंगें मार रहा है; तुझे काल रूपी बुद्धि आ लगी है अब तूने कामपिपासा हेतु स्त्री को लाकर अपने गले लगा लिया है॥ २॥

14यौवन के जोश में तू पराई-नारियों को देखता है और भले-बुरे की पहचान नहीं करता।

15तू कामवासना में मग्न रहकर विष रूपी प्रबल माया के मोह में फँसकर भटकता रहता है; फिर तू पाप एवं पुण्य की पहचान नहीं करता।

16अपने पुत्रों एवं सम्पति को देखकर तेरा यह मन अहंकारी हो गया है और अपने हृदय से तूने राम को विस्मृत कर दिया है।

17सगे-सम्बन्धियों की मृत्यु पर तू अपने मन में सोचता है कि तुझे उसका कितना धन प्राप्त होगा हे मानव ! सौभाग्य से मिले अपने अमूल्य जीवन को तूने व्यर्थ गंवा दिया हैं॥ ३॥

18बुढ़ापे में तेरे बाल चमेली के फूलों से भी अधिकतर सफेद हैं और तेरी वाणी इतनी धीमी पड़ गई है, जैसे वह सातवें लोक से आती हो।

19तेरे नेत्रों से जल बह रहा है; तेरी बुद्धि एवं बल शरीर में से लुप्त हो गए हैं; ऐसी अवस्था में काम तेरे मन में से यूं मंथन करता है, जैसे दूध का मंथन किया जाता है।

20इसलिए तेरी बुद्धि में विषय-विकारों की झड़ी लगी हुई है; तेरा शरीर मुरझाए हुए फूल जैसा हो गया है।

21तुम अलक्ष्य प्रभु की वाणी को छोड़कर नश्वर जगत् के कार्यों में लीन हो रहे हो, तदुपरांत तुम पश्चाताप करोगे ॥४॥

22नन्हे-मुन्ने छोटे बच्चों को देखकर तेरे मन में बड़ा प्रेम उत्पन्न होता है और तू उन पर गर्व करता है परन्तु तू ईश्वर बारे कोई सूझ प्राप्त नहीं करता।

23चाहे तेरे नेत्रों से कुछ भी नहीं दिखाई देता फिर भी तू लम्बी आयु की लालच करता है।

24अंत को शरीर का बल काम करने से थक जाता है और मन रूपी पक्षी शरीर रूपी पिंजरे में से उड़ जाता है। घर के आंगन में पड़ा मृतक शरीर किसी को अच्छा नहीं लगता।

25भगत वेणी जी कहते हैं, हे भक्तो ! सुनो, मृत्यु के पश्चात किसी ने भी मुक्ति प्राप्त नहीं की ॥५॥

26सिरीरागु॥

27हे प्रभु ! तू ही मैं हूँ और मैं ही तुम हूँ।;तेरे और मेरे बीच कोई अन्तर नहीं है।

28यह अन्तर ऐसा है जैसे स्वर्ण एवं स्वर्ण से बने आभूषण का है; जैसे जल एवं इसकी लहरों में है; वैसे ही प्राणी और ईश्वर है॥ १ ॥

29हे अनंत परमेश्वर ! यदि मैं पाप न करता;

30तो तेरा पतितपावन नाम कैसे होता ? ॥१॥ रहाउ॥

31हे अन्तर्यामी प्रभु ! तुझे जगत् का स्वामी कहा जाता है।

32प्रभु से उसके दास की एवं दास से उसके स्वामी की पहचान हो जाती है। ॥ २॥

33हे प्रभु ! मुझे यह ज्ञान दीजिए कि जब तक मेरा यह शरीर है, तब तक मैं तेरा नाम-सिमरन करता रहूँ।

34भक्त रविदास जी का कथन है कि हे प्रभु ! मेरी यही कामना है कि कोई महापुरुष आकर मुझे यह ज्ञान दे जाए कि तू समस्त स्थानों में विद्यमान हे॥३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं