सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 939 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1हम तीर्थों में स्नान करते हैं और इसका सुख रूपी फल प्राप्त करते हैं और मन को जरा भी अहम् की मैल नहीं लगती।

2गोरख का पुत्र लोहारीपा कहता है केि योग की युक्ति यही है॥ ७ ॥

3(गुरु जी सिद्धों को उपदेश देते हुए कहते हैं कि) जीव को बाजारों एवं नगरों में अज्ञानता की निद्रा नहीं आनी चाहिए और न ही पराई नारी के रूप को देखकर उसका मन डगमगाना चाहिए।

4किन्तु नाम के बिना जीव का मन टिक कर नहीं बैठता और न ही उसकी तृष्णा की भूख मिटती है।

5जिस व्यक्ति को गुरु ने उसके अन्तर्मन में शरीर रूपी नगर, दसम द्वार रूपी घर दिखा दिया है, वह सहज ही सत्य का व्यापार करता रहता है।

6वह थोड़ी ही निद्रा करता है और थोड़ा-ही भोजन करता है। हे नानक ! यही हमारा तत्व विचार है॥ ८ ॥

7(योगी गुरु जी से कहते हैं कि) योगीराज गोरखनाथ के पंथ का वेष धारण करो, कानों में मुद्रा, झोली एवं कफनी ग्रहण करो।

8योगियों के बारह वेषों में से गोरख वाले इस वेष को ही धारण करो, यह शास्त्रों में बताए हुए छ: पंथों में से एक श्रेष्ठ पंथ है।

9हे महापुरुष ! जो व्यक्ति इस विधि द्वारा मन को समझा लेता है, वह पुनः आवागमन की चोटें नहीं खाता।

10गुरु नानक कहते हैं कि योग की युक्ति तो यूं प्राप्त होती है कि जीव गुरुमुख बनकर सत्य का बोध कर ले॥ ९ ॥

11(गुरु जी योगियों को समझाते हैं कि) जिस व्यक्ति ने अपना अहम् एवं ममता दूर कर ली है, वह अपने अन्तर्मन में अनहद शब्द को सुनता रहता है और यही उसके कानों की मुद्राएँ हैं।

12ऐसे ही वह काम, क्रोध एवं अहंकार को दूर कर लेता है, परन्तु गुरु के शब्द द्वारा ही सुमति प्राप्त होती है।

13गुरु नानक कहते हैं कि एक परमात्मा ही जीव को भवसागर से पार करवाता है और उस सर्वव्यापक का सिमरन करना ही जीव के लिए कफनी एवं झोली धारण करना है।

14सबका मालिक प्रभु सत्य है, उसकी महिमा भी सत्य है, वह जीव परख लेता है कि गुरु की बात ही उत्तम है॥ १० ॥

15जिसने अपने मन को विषय-विकारों से उलटा लिया है, यही उसका खप्पर है। आकाश, वायु अग्नि, जल एवं धरती इन पाँच भूतत्वों के गुण ही उसकी टोपी है।

16जिसने काया को पवित्र कर लिया है, यही उसका कुश का आसन है और मन को वशीभूत करना ही उसकी लंगोटी है।

17सत्य, संतोष एवं संयम-यह शुभ गुण उसके साथ रहने वाले साथी हैं।

18हे नानक ! ऐसा जीव गुरुमुख बनकर नाम-स्मरण करता रहता है ॥११ ॥

19(सिद्ध योगी गुरु नानक देव जी से प्रश्न करते हैं-) वह कौन है, जो गुप्त रहता है ? वह कौन है जो बन्धनों से मुक्त है?

20वह कौन है, जो अन्दर-बाहर शब्द से जुड़ा रहता है ?

21वह कौन है, जो दुनिया में जन्म लेकर आता है और वह कौन है, जो चला जाता है ?

22वह कौन है, जो आकाश, पाताल, पृथ्वी तीनों लोकों में समाया रहता है ?॥ १२॥

23(गुरु नानक देव जी सिद्धों को उत्तर देते हैं कि) घट-घट में व्यापक परमात्मा गुप्त रहता है और गुरुमुख ही बन्धनों से मुक्त है और

24अन्दर बाहर व्यवहार करता हुआ शब्द से जुड़ा रहता है।

25स्वेच्छाचारी प्राणी नाश हो जाता है और जन्म-मरण के चक्र में फँसा रहता है।

26गुरु नानक का कथन है कि गुरुमुख सत्य में ही विलीन रहता है॥ १३॥

27(सिद्ध दोबारा प्रश्न करते हैं कि) कोई मनुष्य बन्धनों में क्यों बंधा हुआ है ? और माया रूपी सर्पिणी ने क्यों ग्रास बना लिया है ?

28किसी जीव ने क्योंकर सत्य को खो दिया है और क्योंकर सत्य को पा लिया है ?

29जीव का मन कैसे निर्मल होता है और कैसे अज्ञानता का अंधेरा दूर होता है?

30जो इस ज्ञान-तत्व का विचार करे, वही हमारा गुरु है॥ १४॥

31(गुरु नानक देव जी उत्तर देते हैं कि) मनुष्य को उसकी दुर्मति ने बन्धनों में बांध लिया है और माया रूपी सर्पिणी ने उसे निगल लिया है।

32मनमुखी जीव ने सत्य को खो दिया है और गुरुमुख ने सत्य को पा लिया है।

33जिसका सतगुरु से साक्षात्कार हो जाता है, उसका अज्ञान रूपी अंधेरा दूर हो जाता है।

34हे नानक ! गुरुमुख जीव अपने अहम् को मिटाकर सत्य में विलीन हो जाता है॥ १५ ॥

35(गुरु साहिब जी सिद्धों को समझाते हैं कि) यदि अन्तर्मन को शून्यावस्था में नेिरन्तर लीन करके उसके संकल्पों विकल्पों पर अंकुश लगा दिया तो

36जीव रूपी हंस उड़ता नहीं अर्थात् स्थिर हो जाता है और उसका अन्त नहीं होता।

37वह सच्चा जीव रूपी हंस सहजावस्था रूपी घर को पहचान लेता है।

38हे नानक ! सच्चे परमेश्वर को ऐसा सत्यवादी जीव ही प्रिय लगता है॥ १६॥

39(सिद्ध गुरु जी से प्रश्न करते हैं कि) हे उदासी संत ! तूने अपना घर किस कारण त्याग दिया है ?

40तूने किस कारण यह उदासियों वाला भेष धारण किया है ?

41तुम किस सौदे के व्यापारी हो ?

42तुम अपने साथियों को कैसे भवसागर से पार करवा सकते हो ?॥ १७॥

43(गुरु नानक देव जी उत्तर देते हैं कि) हम गुरुमुख संतों की खोज में उदासी बने हैं और

44संतों महापुरुषों के दर्शन करने के लिए यह भेष धारण किया हुआ है।

45हम सत्य-नाम रूपी सौदे के व्यापारी हैं और

46गुरुमुख जीव भवसागर से पार हो जाते हैं।१८ ॥

47(सिद्धों ने गुरु जी से पुनः प्रश्न किंया-) हे महापुरुष ! तूने किस विधि द्वारा अपना जीवन बदल लिया है और

48तूने किससे अपना यह मन लगा लिया है ?

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं