सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 938 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1वह इस विद्या की भलीभांति पड़ताल करके ज्ञान प्राप्त करता हैं और राम नाम में ध्यान लगाकर रखता है।

2मनमुख जीव विद्या का विक्रय करता है, इस तरह विष प्राप्त करता और विष ही खाता है।

3मूर्ख को शब्द की पहचान नहीं होती और न ही कोई सूझबूझ होती है।॥ ५३॥

4उस पंडित को ही गुरुमुख कहा जाता है, जो अपने विद्यार्थियों को भी यही उपदेश देता है केि

5नाम स्मरण करो, नाम का संग्रह करो और जग में लाभ प्राप्त करो।

6वह विद्यार्थी ही सच्ची पट्टी लिखता है, जो मन में सत्य का अध्ययन करता और शब्द को धारण करता है।

7हे नानक ! वही शिक्षित एवं चतुर पण्डित है, जिसने अपने गले में राम नाम का हार पहन लिया है॥ ५४॥ १॥

8रामकली महला १ सिध गोसटि

9ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

10सभी सिद्ध सभा में अपने आसनों पर बैठ गए और उन्होंने कहा केि संत-सभा को नमन है।

11(गुरु नानक देव जी उत्तर देते हैं कि) हमारी तो उस अपरम्पार परम सत्य ईश्वर के समक्ष ही वंदना है,

12हम अपना शीश काट कर भी उसे भेंट करते हैं और मन-तन भी उसे अर्पण करते हैं।

13हे नानक ! यदि कोई संत मिल जाए तो ही परमसत्य की प्राप्ति होती है और सहज स्वभाव ही यश मिलता है॥ १॥

14अपना घर-बार छोड़कर देश-परदेश भटकने से क्या सत्य एवं शुद्धता प्राप्त हो सकती है ?

15सच्चे शब्द के बिना किसी की भी मुक्ति नहीं होती।॥ १॥ रहाउ॥

16(सिद्धों ने गुरु जी से प्रश्न किया) तुम कौन हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? तुम्हारा कौन-सा मार्ग है ? और तुम्हारा क्या जीवन-उद्देश्य है ?

17आप से हमारी प्रार्थना है कि हमें सत्य बताओ, हम संतजनों पर बलिहारी जाते हैं।

18(सिद्धों ने गुरु नानक देव को संबोधित किया-) हे बालक ! तू कहीं बैठता है ? तू कहाँ रहता है ? तू कहाँ से आया है ? और तूने कहाँ जाना है ?

19नानक कहते हैं कि बैरागी पूछते हैं कि तुम्हारा क्या राह है?॥ २॥

20(गुरु नानक देव जी ने सिद्धों को उत्तर दिया-) हम तो घट-घट में निवास करने वाले परमात्मा के ध्यान में ही लीन रहते हैं और सतिगुरु की रज़ा में ही चलते हैं।

21हमें तो प्रभु ने ही भेजा है, उसके हुक्म से ही आया हूँ और नानक तो सदा ईश्वरेच्छा में ही चलता है।

22हमने ऐसी गुरुमत ही पाई है कि नारायण सदैव स्थिर है और आसन पर बैठने वाला वह स्वयं ही है।

23गुरुमुख इस तथ्य को समझ लेता है, अपने आपको पहचान लेता है और परमसत्य में ही विलीन हो जाता है।३॥

24(सिद्धों ने प्रश्न किया-) कहा जाता है कि यह दुनिया कठिनाई से पार किया जाने वाला सागर है, इसमें से कैसे पार हुआ जा सकता है ?

25फिर चरपट नाथ बोले-हे अवधूत नानक ! इस तथ्य के बारे में सच्चा विचार बताओ।

26(गुरु जी ने कहा केि) जो स्वयं इस तथ्य को कह रहा है, स्वयं ही उसे समझता भी है, उसे क्या उत्तर दिया जाए ?

27सत्य कहो, तुम तो संसार सागर से पार हो चुके हो, तुझे चर्चा के लिए संत-सभा में बैठने ही क्यों दें ? फिर भी बताता हूँ।

28(गुरु जी उत्तर देते हैं कि) हे चरपट ! जैसे जल में कमल का फूल निर्लिप्त रहता है और नदी में तैरती हुई मुर्गाबी अपने पंख भोगने नहीं देती,

29वैसे ही प्रभु का नाम जपने एवं शब्द में ध्यान लगाने से संसार-सागर से पार हुआ जा सकता है।

30जो एकांत में रहकर परमात्मा को मन में बसा लेता है, वह जीवन की आशाओं से निर्लिप्त हो जाता है।

31हे नानक ! मैं तो उस महापुरुष का दास हूँ जो अगम्य, अगोचर परमात्मा के दर्शन करकेअन्यों को भी उसके दर्शन करवा देता है॥ ५ ॥

32(योगी कहते हैं कि) हे स्वामी ! हमारी प्रार्थना सुनो: हम आप से सच्चा विचार पूछते हैं।

33किसी प्रकार का रोष मत करना और सही उत्तर देना केि गुरु द्वारा परमात्मा को कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?

34गुरु नानक कहते हैं कि नाम ही जीवन का आधार है, यह चंचल मन सत्य रूपी घर में स्थित हो जाता है।

35जब सत्य से प्रेम हो जाता है तो परमेश्वर स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है॥ ६ ॥

36योगी अपने मत का ज्ञान कहते हैं कि हम बाजारों और नगरों की ओर जाने वाले रास्तों से दूर जंगलों में वृक्षों एवं पेड़ों के नीचे निराले ही रहते हैं और

37कदमूल का आहार खाकर निर्वाह करते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं