सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 937 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1उस जीव रूपी नारी ने ही हरि रूपी वर प्राप्त किया है, जिसका अहम् दूर हो गया है और उसका दुख कट गया है॥ ४७ ॥

2संसार में हर कोई सोना-चांदी इकट्ठा करने में लगा रहता है परन्तु यह धन तो कच्चा और विष रूप राख के समान हैं।

3कोई धन दौलत संचित करके स्वयं को साहूकार कहलवाता है, किन्तु दुविधा में फँसकर वह दुखी ही होता है।

4परमात्मा का सत्य-नाम ही अमूल्य है, इसलिए सत्यवादी सत्य ही संचित करता रहता है।

5जो निर्मल एवं पावन परमेश्वर का ध्यान करते हैं, उन सत्यवादियों का ही सम्मान होता हैं और उनका वचन भी सत्य है।

6हे परमेश्वर ! तू ही चतुर है, तू ही मेरा साजन एवं मित्र हैं और तू ही गुरु रूपी सरोवर एवं तू ही संत रूप हंस है।

7मैं उस पर बलिहारी जाता हैं, जिसके मन में सच्चे ठाकुर का निवास है।

8माया-ममता जो जीव को मोहित करने वाली है, जिसने इसे उत्पन्न किया है, उसे जानो।

9जो चतुर पुरुष इस तथ्य को बूझ लेता है, उसके लिए विष एवं अमृत भी एक समान है॥४८॥

10वे क्षमाविहीन जीव भी मर-खप गए हैं, जिनकी संख्या लाखों करोड़ों को छू रही है।

11उनकी गिनती नहीं की जा सकती , फिर उनकी कैसे गणना की जाए, असंख्य मनुष्य खप-खप कर मर गए हैं।

12जो अपने मालिक को पहचान लेता है, वह बन्धनों में नहीं पड़ता और उसके पूर्व सभी बन्धन भी खुल जाते हैं।

13तू शब्द द्वारा प्रभु-दरबार के लिए उत्तम बन जा, तुझे क्षमा, सत्य, सुख एवं प्रेम प्राप्त हो जाएगा।

14यदि यात्रा व्यय के लिए सत्य का धन है और परमात्मा का ध्यान करता रहे तो वह स्वयं ही तेरे शरीर में निवास कर जाएगा।

15यदि अपने मन, तन एवं मुख में प्रभु का नाम जपता रहे तो अन्तर्मन में शुभ-गुण उत्पन्न हो जाएगे और मन में धैर्य हो जाएगा।

16अभिमान जीवों को नष्ट करता रहता है और हरि-नाम के बिना वस्तु विकार रूप हैं।

17जीवों को पैदा करके परमेश्वर ने अपने आपको उनमें स्थिर किया है, पर अपरंपार कर्ता-प्रभु निर्लिप्त है।॥ ४९ ॥

18उस सृष्टि रचयिता का भेद कोई नहीं जानता।

19वह स्रष्टा जो कुछ करता है, यह निश्चय ही होता है।

20कुछ लोग धन के लिए ईश्वर का ध्यान करते हैं किन्तु

21उन्हें धन तो पूर्व कर्मो के भाग्यानुसार ही मिलता है।

22लोग धन के लिए दूसरों के नौकर बन जाते हैं और कुछ चौर भी बन जाते हैं,

23किन्तु मरणोपरांत धन जीव के साथ नहीं जाता और यह किसी अन्य संबंधी का ही बन जाता है।

24सत्य का ध्यान किए बिना प्रभु के दरबार में किसी को भी आदर नहीं मिलता।

25जो हरि-नाम रूपी रस का पान करता है, वह जन्म-मरण से छूट जाता हैं ॥५०॥

26हे सखी ! मैं यह देख-देख हैरान हो रही हूँ कि

27जो मैं अहंत्व करती रहती थीं, वह अहंम समाप्त हो गया है। मेरे मन में ज्ञान उत्पन्न हो गया है और ब्रह्म-शब्द में ही लीन रहती हूँ।

28में हार, परांदी और कंगन इत्यादि सब आभूषणों का श्रृंगार कर-करके थक चुकी हैं।

29अब मैने सर्व गुणों का हार अपने गले में डाल लिया है और प्रियतम प्रभु से मिलकर सुख प्राप्त कर लिया है।

30हे नानक ! गुरु के माध्यम से ही प्रभु से प्रेम होता है।

31मन में विचार करके देख लो कि भगवान के बिना किसी को भी सुख उपलब्ध नहीं हुआ।

32हरि की कथा पढ़नी चाहिए, हरि को समझना चाहिए और उससे ही प्रेम बनाकर रखो।

33सदैव हरि को ही जपते रहना चाहिए, हरि का ही भजन करना चाहिए, चूंकि हरि का नाम ही हमारा जीवनाधार है॥ ५१॥

34हे सखी ! ईश्वर ने जो भाग्य लिख दिया है, वह कभी मिट नहीं सकता।

35जिस ने स्वयं संसार बनाया है, वही कृपा करके अपने चरण-कमल हृदय में बसा देता हैं।

36गुरु के ज्ञान द्वारा इस तथ्य को समझ लो, सब बड़ाईयाँ परमात्मा के हाथ में हैं।

37भाग्य बदला नहीं जा सकता, जैसी नियति है, वैसा ही होना है।

38उसकी कृपा-दृष्टि से ही सुख उपलब्ध होता है, हे नानक ! शब्द का चिंतन करो।

39मनमुख जीव भटक कर नष्ट हो गए हैं, पर गुरु के विचार द्वारा गुरमुखों का उद्धार हो गया है।

40जो सत्यपुरुष नजर ही नहीं आता, उसका वर्णन क्या कहकर किया जाए।

41मैं अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ, जिसने हृदय में ही परमात्मा के दर्शन करवा दिए हैं।५२॥

42पाण्डे (पंडित) को शिक्षित तभी कहा जाता है, यदि सह सहज-स्वभाव आध्यात्मिक विद्या का विचार करता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं