सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 936 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1कितने ही जीव यह माया मेरी है, कहते हुए प्रभु नाम के बिना दुख भोगते हुए जीवन त्याग गए हैं।

2बाजीगर की खेल की तरह राजाओं के दुर्ग, मन्दिर, महल और उनका दरबार कहाँ रह जाता है ?

3हे नानक ! ईश्वर के सच्चे नाम के बिना जीव का आवागमन सब झूठा है।

4परमात्मा आप ही चतुर एवं सुन्दर है और आप ही बुद्धिमान एवं सर्वज्ञाता है ॥ ४२ ॥

5जो भी जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अटल है और जन्म-मरण के चक्र में पड़कर जीव पछताता रहता है।

6यह चौरासी लाख योनियों वाली पृथ्वी उनके जन्म-मरण से न कभी घटती हैं और न ही कभी बढ़ती है।

7जिन्हें ईश्वर भा गया है, उनका उद्धार हो गया है।

8उनकी दुनिया की लालसा साप्त हो गई हैं और माया भी प्रभावित नहीं कर रही।

9दुनिया में जो कुछ भी नजर आ रहा है, वह नाशवान है, फिर मैं किसे मित्र बनाऊँ।

10मैं अपना जीवन उसे समर्पित कर दूंगा और तन-मन भी उसे न्यौछावर कर दूंगा।

11हे सृजनहार ! एक तू ही स्थिर रहने वाला है। मुझे तो उस मालिक का ही सहारा है।

12गुणों की मारी हुई अहंकार भावना समाप्त हो गई है, जब मन ब्रह्म-शब्द में लीन हुआ तो विकारों को बड़ी चोट लगी ॥४३॥

13राणा-राव, अमीर-गरीब एवं फकीर कोई भी सदा नहीं रहता, चूंकि सबकी मृत्यु अटल है।

14अपनी-अपनी बारी आने पर सभी जगत से चले जाते हैं और कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता।

15गहरे सागर एवं ऊँचे पहाड़ों वाले पथ की तरह मृत्यु का मार्ग बहुत बुरा एवं भयानक है।

16मैं अपने शरीर पर अनेक अवगुणों के कारण दुखी हूँ, फिर गुणों के बिना मैं अपने सच्चे घर में कैसे जाऊँ ?

17गुणवान जीव अपने गुण साथ लेकर प्रभु से मिल गए हैं, मैं उनसे प्रेमपूर्वक कैसे मिलू?

18मेरी कामना है कि हृदय में प्रभु का नाम जप-जपकर मैं भी उन जैसी गुणवान बनी रहूं।

19दुनिया में प्रत्येक जीव अवगुणों से भरा हुआ है, परन्तु गुण भी उनके साथ ही बसते हैं।

20जब तक जीव शब्द का चिंतन नहीं करता, सतिगुरु के बिना उसे गुण हासिल नहीं होते ॥ ४४॥

21जिंदगी के इस खेल में कुछ जीवों ने अपनी स्थिति संभाल ली है और भाग्य लिखाकर ही आए हैं।

22वे वहीं कार्य करते हैं, जो मालिक ने सौंपा हैं और इस प्रकार लाभ प्राप्त करते हैं।

23उन्होंने लालच, लोभ एवं बुराईयों को छोड़ कर मन से भुला दिया है।

24वे जग रूपी दुर्ग में रहते हुए अपने मालिक की स्तुति करते रहते है और जीवन में कभी पराजित नहीं होते।

25जो कोई खुद को अपने मालिक का चाकर कहलवाता है, पर उसके सामने उत्तर देता है अर्थात् आज्ञा का पालन नहीं करता,

26वह अपनी मेहनत गंवा लेता हैं और उच्च पद पर नहीं बैठता।

27प्रियतम्-प्रभु के हाथ में सब बड़ाईयाँ हैं, जिसे चाहता है, उसे ही देता है।

28वह स्वयं ही सबकुछ करता है, अन्य किसी को क्यों कहा जाए? उसके अलावा अन्य कोई भी करने वाला नहीं ॥ ४५ ॥

29ईश्वर केअतिरिक्त अन्य कोई भी ऐसा नहीं सूझाता जो सदा विश्व का शासन चलाता है।

30वह पुरुषोत्तम् प्रभु ही नरक से निवारण करने वाला है, जिसका नाम सदैव सत्य है।

31मैं उसे वन-वन ढूंढती रहती हैं और मन में उसका ही विचार करती हैं कि

32लाल, रत्न एवं माणिक्य रूपी गुणों का भण्डार सतिगुरु के हाथ में है।

33यदि मुझे प्रभु मिल जाए तो मैं उत्तम हो जाऊँ और एकाग्रचित होकर उसके प्रेम में ही लीन रहें।

34हे नानक ! यदि प्रियतम का नामामृत प्राप्त हो जाए तो लाभ प्राप्त करके परलोक में चली जाऊँ।

35जिस परमेश्वर ने यह विश्व बनाया है, जिसने सारी रचना करके जीवों को उत्पन्न किया है,

36उसका न कोई अंत है और न ही आर-पार है, उस बेअंत परमात्मा का गुरु के माध्यम से ध्यान करना चाहिए ॥ ४६ ॥

37ड़-वह प्रभु अत्यंत सुन्दर है और

38उसके अलावा अन्य कोई दुनिया का राजा नहीं है।

39ड़-तुम गुरु मंत्र सुन लो, हरि मन में बस जाता है।

40गुरु की कृपा से ही परमात्मा प्राप्त होता है, इसलिए किसी भ्र्म में मत भटको।

41वही सच्चा साहूकार है, जिसके पास हरि-धन रूपी पूंजी है।

42वहीं पूर्ण गुरुमुख है, उसे मेरी शाबाश है।

43शब्द-गुरु द्वारा विचार करने से सुन्दर वाणी द्वारा ईश्वर को पाया जा सकता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं