सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 935 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1न उसके पास कोई ज्ञान-ध्यान हैं और न ही कोई धर्म का ध्यान हैं।

2नाम के बिना कोई निडर नहीं हो सकता और अभिमान का दुख नहीं समझ सकता।

3मैं थक गई हूँ, फिर मैं अपनी मंजिल तक कैसे पहुंच सकती हूँ। मेरी जीवन नैया भवसागर में चल रही है, जिसका कोई पार नहीं है।

4ऐसे संतजन भी मेरे सजन नहीं हैं जो परमात्मा के रंग में लीन हैं, फिर मैं किसके पास फरियाद करूँ।

5हे नानक ! यदि प्रिय-प्रिय करती रही तो मिलाने वाला प्रभु अपने साथ मिला लेगा।

6जिसने मुझे वियोग दिया है, वहीं गुरु के अपार प्रेम द्वारा मिला लेगा ॥ ३७ ॥

7पाप बुरा है, किन्तु पापी को यह प्यारा लगता है।

8पापी मनुष्य तो पापों का भार ही सिर पर लादता रहता हैं और अपने पापों का ही प्रसार करता रहता है।

9यदि वह पापों को छोड़कर अपने आप को पहचान ले तो

10उसे कोई दुख, वियोग एवं संताप नहीं लगता।

11वह नरक में पड़ने से कैसे बच सकता है और कैसे यमकाल से छूट सकता है?

12उसे जन्म-मरण का चक्र कैसे भूले? झूठ बुरा है और काल झूठे आदमी को निगल लेता है।

13दुनिया के जाल में फंसा हुआ मन और भी जंजाल में फंस जाता है।

14हरि-नाम के बिना उसकी मुक्ति कैसे संभव है? वह पापों में फंसा ही बर्बाद हो जाता है॥३८ ॥

15जीव रूपी कौआ बार-बार फंदे में फँसता रहता है परन्तु

16फिर वह पछताता है, फंदे में से छूटने के लिए अब उससे कुछ भी नहीं हो सकता।

17वह फंदे में फंसा हुआ भी विषय-विकार रूपी चोगा चुगता रहता है, पर यह समझता नहीं।

18यदि उसे सतगुरु मिल जाए तो उसे अपनी आँखों से फंदे एवं चोगे का ज्ञान हो जाए।

19जैसे मछली फँसी होती है, वैसे ही जीव मृत्यु के के जाल में फसा हुआ है।

20दाता गुरु के बिना किसी से मुक्ति की उम्मीद मत करो अन्यथा,

21जीव बार-बार जन्म लेता है और बार-बार मरता रहता है।

22यदि वह ईश्वर के रंग में लीन होकर उसका ध्यान करता रहे तो

23आवागमन से मुक्त हो जाता है और पुनः उसे मृत्यु की फाँसी नहीं पड़ती ॥ ३६॥

24मनुष्य की काया आत्मा को भाई-भाई कहकर बुलाती रहती है परन्तु प्राण छूटने पर उसका भाई पराया बनकर उसकी ओर दृष्टि भी नहीं करता।

25आत्मा रूपी भाई परलोक में चला जाता हैं और उसकी काया रूपी बहिन वियोग की अग्नि में जल जाती हैं।

26अपने पिता के घर में रहती हुई बेटी खिलौने से खेलकर विवाह-योग्य हो जाती है,

27यदि वह कामिनी अपने पति को पाना चाहती है तो उसे सच्चे गुरु की सेवा करनी चाहिए।

28कोई विरला ज्ञानी ही इस तथ्य को बूझता है कि सतिगुरु ही सत्य से मिलाप करवाता है।

29उस ठाकुर जी के हाथ में सब बड़ाईयाँ हैं, जिसे चाहता है, उसे ही देता है।

30यदि कोई गुरुमुख बन जाता है तो ऐसा विरला ही वाणी का विचार करता है।

31यह वाणी महापुरुष की रची हुई है और इससे जीव का अपने सच्चे घर में निवास हो जाता है। ४०॥

32परमेश्वर (तत्वों को) तोड़-तोड़कर जगत् का निर्माण करता है और जगत्-निर्माण करके उसका विनाश कर देता है, वह बिगाड़कर फिर से बनाता है, वह जीवों को पैदा करके उनका नाश कर देता है।

33वह सर्वकला समर्थ एवं बेपरवाह परमेश्वर भरे हुए सरोवरों को सुखा देता और पुनः उन्हें भर भी देता है।

34जो जीव भ्रम में भूले हुए हैं, वे पगले हो गए हैं और भाग्य के बिना कुछ भी हासिल नहीं होता।

35गुरु के माध्यम से ही यह ज्ञान होता है कि प्रत्येक जीव की जीवन-डोरी प्रभु ने अपने हाथ में पकड़ी हुई है। वह जीवों को जिधर चता है, वे उधर ही चल पड़ते हैं।

36जो भगवान का गौरवगान करके सदैव उसके रंग में लीन रहता है, उसे कोई दुबारा पछतावा नहीं होता।

37भ–सत्य की खोज करने वाले गुरु द्वारा सत्य का मार्ग बूझ लेते हैं और अपने सच्चे घर में निवास प्राप्त कर लेते हैं।

38भ-इस भवसागर से पार होने वाला मार्ग बहुत कठिन है और इच्छाओं से इच्छारहित होकर ही इसमें से पार हुआ जा सकता है।

39जो व्यक्ति गुरु की कृपा से आत्म-ज्ञान को समझ लेता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है ॥ ४१॥

40यह माया मेरी है, यह धन-दौलत मेरा अपना हैं। यही कहते हए कितने ही लोग दुनिया छोड़ गए हैं, परन्तु यह माया किसी के साथ नहीं गई।

41आत्मा रूपी हंस मायूस होकर दुनिया से चल देता है परन्तु माया उसे यही भूली रहती है।

42मोह-माया में फसा हुआ मन झूठा है और मृत्यु ने उसे देख लिया है। मरणोपरांत जीव के अवगुण उसके साथ ही जाते हैं।

43यदि उसके पास गुण हो तो उसका अशुद्ध मन विकारों की ओर से पलट कर शुद्ध मन में ही समा जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं