गुरु ग्रंथ साहिब 934 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1जिसने मुझे नाम दिया है, उसकी ही सेवा करती हैं और उस पर ही बलिहारी जाती हैं।
2जो दुनिया को बनाता है, वही उसका नाश करने वाला है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई समर्थ नहीं।
3गुरु की कृपा से उसका ध्यान-मनन किया जाए तो तन को कोई दुख नहीं होता ॥ ३१॥
4मैं किसका सहारा लूँ ? कोई भी मेरा अपना नहीं हैं। भगवान के अलावा न कोई साथी था और न ही कभी कोई होगा।
5जीव जन्म-मरण के चक्र में नष्ट होता रहता है और उसे दुविधा का रोग सताता रहता है।
6नामविहीन आदमी बालू की दीवार की मानिंद ध्वस्त हो जाता हैं।
7नाम के बिना वह कैसे छुटकारा प्राप्त कर सकता है, अंत में वह रसातल में जा गिरता है।
8यह सच्चा परमेश्वर अनंत है, किन्तु जीव अक्षरों द्वारा गिनती करता रहता है।
9अज्ञानी जीव मतिहीन है और गुरु के बिना उसे ज्ञान नहीं होता।
10जैसे रबाब की टूटी हुई तार टूटने के कारण बजती ही नहीं,
11हे नानक ! वैसे ही प्रभु संयोग बनाकर बिछुड़े जीवों को मिला लेता है॥३२॥
12यह शरीर एक वृक्ष है और मन पक्षी है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ रूपी अन्य पक्षी भी इस पर बैठे हुए हैं।
13जब वे पाँचों के साथ मिल कर तत्व-ज्ञान रूपी फल चुगते रहते हैं तो इन्हें किचित मात्र भी माया का फंदा नहीं पड़ता।
14जब वे उस दाने को चुगने के लिए व्याकुल होकर उड़े तो
15उन्हें माया का फंदा पड़ गया और उनके पंख टूट गए, उनके अपने अवगुणों के कारण यह विपत्ति पैदा हो गई।
16सत्य के बिना जीव कैसे छूट सकता है और उसे गुण रूपी मणि उसकी कृपा से ही हासिल होती है।
17वह मालिक-प्रभु स्वयं महान है, यदि वह स्वयं बन्धनों से मुक्त कराए तो ही छुटकारा हो सकता है।
18जब वह स्वयं कृपा करता है तो गुरु की कृपा से जीव बन्धनों से छूट जाता है।
19सब बड़ाईयों परमात्मा के हाथ में है, यदि उसे मंजूर हो तो ही प्रदान करता है ॥ ३३ ॥
20जीवात्मा प्रभु शरण रुपीं स्थान से विहीन होकर थर-थर काँपता हैं।
21एक सच्चा परमेश्वर ही इसे शरण एवं आदर देता है और फिर इसका कोई कार्य नहीं बिगड़ता।
22वह नारायण स्थिर है, गुरु स्थिर है एवं उसका सुच्चा विचार सदैव स्थिर हैं।
23है परमेश्वर ! तू देवताओं, नरों, नाथों का भी नाथ हैं, तू ही बेसहारों का सहारा है।
24विश्व के सब स्थानों में तेरा ही वास है और तू ही सबका दातार है।
25जिधर भी देखता हूँ, वहाँ केवल तू ही है और तेरा कोई अन्त एवं आर-पार नहीं।
26ईश्वर सर्वव्यापक हैं, पर इस तथ्य का ज्ञान गुरु के शब्द से ही होता है।
27वह अगम्य अपार परमेश्वर इतना बड़ा है कि बिना माँगे ही जीवों को दान देता रहता है।॥ ३४ ॥
28हे परम पिता ! तू दया का पुंज हैं, सब जीवों को तू दया का दान करता है और स्वयं ही रचना करके देखभाल भी करता है।
29हे प्रभु ! जिस पर तू दया करता है, उसे साथ मिला लेता है, तू अपनी इच्छा से एक क्षण में ही बनाकर नष्ट कर देता है।
30तू ही चतुर एवं सर्वज्ञाता है, तू दानियों में सबसे बड़ा दानवीर है।
31तू गरीबी को मिटाने वाला और दुखों को नाश करने वाला है, गुरु के माध्यम से ही जीव को ज्ञान-ध्यान की प्राप्ति होती हैं ॥३५ ॥
32मूर्ख आदमी का चित हर वक्त धन में ही लगा रहता है और धन के चले जाने से वह बहुत दुखी होता हैं।
33किसी विरले ने ही नाम रुपी सच्चा धन संचित किया है और प्रभु के निर्मल नाम से ही प्यार लगाया हुआ हैं।
34यदि मन प्रभु के रंग में लीन है तो धन चले जाने से कोई फर्क नहीं होता।
35मन अर्पित करके, अपना सिर सौंपकर भी जीव ईश्वर का सहारा ही लेता है।
36जब मन में ब्रहा शब्द का आनंद उत्पन्न हो गया तो दुनिया के धंधे समाप्त हो गए।
37जब गोविंद गुरु से भेंट हो जाए तो दुर्जन भी सज्जन बन जाते हैं।
38जिस नाम रूपी वस्तु को ढूँढती हुई वन-वन में भटक रही थी, वह वस्तु तो हृदय-घर में ही मिल गई।
39जब से सतिगुरु ने परम सत्य से मिलाप करवाया है, जन्म-मरण का दुख दूर हो गया है॥ ३६ ॥
40अनेक प्रकार के कर्मकाण्ड करने से बन्धनों से छुटकारा नहीं होता और गुणहीन जीव को यमपुरी में ही जाना पड़ता है।
41न ही उसका इहलोक और न ही परलोक संवरता है, अवगुणों के कारण वह पछताता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं