गुरु ग्रंथ साहिब 933 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1उसकी काया पानी के ऊपर काई की तरह क्षीण हो जाती है ॥२४॥
2तीनों लोकों में प्रभु ही व्यापक मालूम होता है।
3युग-युगान्तर केवल वही दाता है और उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।
4हे जगत् के रखवाले ! जैसे तुझे मंजूर होता है, वैसे ही तू जीवों को रखता है।
5मैं तुझसे ही यश मांगता हूँ, तू मुझे मान-सम्मान प्रदान करता है।
6यदि तुझे उपयुक्त लगे तो मैं सदैव मोह-माया से जाग्रत हैं।
7यदि तू अपने साथ मिला ले तो मैं तुझ में ही विलीन हो जाऊँ।
8हे जगदीश ! मैं तेरी ही जय-जयकार करता रहूँ और तेरा ही नाम जपता रहूँ।
9गुरु उपदेशानुसार शत्-प्रतिशत जगदीश्वर से मिलाप हो जाता हैं ॥२५ ॥
10जगत से वाद-विवाद करने का क्या अभिप्राय है? यह तो निरा झख मारना ही हैं।
11जब लोग उस मनुष्य के उन्मादपन को देखते हैं तो वह शर्म से ही मर जाता है।
12वह जन्म-मरण में पड़ा रहता हैं परन्तु वास्तविक जीवन की आशा नहीं रखता,
13वह जन्म लेकर जगत् में आता है और आशा के बिना निराश हो चल देता है।
14इस पर वह कष्ट उठा-उठाकर मिट्टी में मिल जाता हैं।
15जो भगवान का गुणगान करता है, काल भी उसे निगल नहीं सकता।
16हरिनाम से ही नवनिधियों की प्राप्ति होती हैं और
17यह नवनिधियाँ वह स्वयं ही सहज स्वभाव अपने भक्तों को देता है॥ २६ ॥
18परमात्मा स्वयं ही गुरु के रूप में ज्ञान का उपदेश देता है और स्वयं ही शिष्य के रूप में इस ज्ञान को बुझता हैं।
19वह स्वयं ही ज्ञान को समझता और स्वयं हीं सूझता हैं।
20ज़ों गुरु के उपदेश को हृदय में बसा लेते हैं,
21वे निर्मल और शुद्ध हो जाते हैं और वहीं परमेश्वर को प्रिय लगते हैं।
22गुरु गुणों का सागर है और उसमें गुण रूपी रत्नों की कोई कमी नहीं है।
23उसमें सत्य रूप लाल पदार्थ बेशुमार हैं।
24वहीं कार्य करो, जो गुरु करने के लिए कहता है।
25जो गुरु की अपनी करनी है,उससे पीछे क्यों भागते हो।
26हे नानक ! गुरु मतानुसार नाम-जपकर सत्य में विलीन हो जाओ ॥ २७ ॥
27यदि सच्ची बात सामने की जाए तो प्रेम टूट जाता है।
28जैसे दोनों तरफ से पकड़ी हुई बाजू टूट जाती हैं,
29वैसे ही बुरे वचन बोलने से प्रीति टूट जाती है।
30दुर्मति वाली पत्नी को उसका पति त्याग देता है।
31यदि भूल पर विचार किया जाए तो टूटी हुई प्रेम की गांठ पुनः जुड़ जाती है।
32गुरु के शब्द द्वारा सब कार्य पूर्ण हो जाते हैं।
33जिसे सत्य का लाभ प्राप्त हो जाता है, उसे कोई कमी नहीं आती।
34तीनों लोकों का स्वामी परमात्मा ही जीव का घनिष्ठ मित्र बनता है ॥ २८ ॥
35अपने मन को बाहर भटकने से रोको और इसे टिकाकर रखो।
36दुनिया व्यर्थ ही लड़-झगड़ कर मर गई हैं, पर यह अपने अवगुणों के कारण बाद में पछतावा करती है।
37जगत् का मालिक एक प्रभु ही हैं, अन्य सब ज़ीव-स्त्रियाँ उसकी पत्नियाँ हैं।
38झूठी जीव-स्त्री अनेक पाखण्ड़ करती रहती है।
39प्रभु ने पराए घर में जाने वाली जीव-स्त्री को रोक दिया है और उसे अपने आत्मस्वरूप में बुला लिया है।
40उस जीव-स्त्री को अपने पति-प्रभु के घर में जाने से किसी ने बाधा उत्पन्न नहीं की।
41उसने शब्द द्वारा स्वयं को संवार लिया है और वह प्रभु की प्रिया बन गई है।
42वही जीव-स्त्री सुहागिन है, जिसे ठाकुर जी ने धारण किया है।॥२९॥
43हे सखी ! भटकते-भटकते मेरे सारे श्रृंगार एवं वस्त्र फट गए हैं।
44तृष्णाग्नि के कारण शरीर में सुख उपलब्ध नहीं होता और परमात्मा के भय बिना सबकुछ नाश हो गया है।
45प्रभु-भय द्वारा मैं हृदय-घर में मृत पड़ी रहती थी, परन्तु चतुर पति-प्रभु ने मुझ पर करुणा-दृष्टि की है।
46मेरे गुरु ने प्रभु-भय मेरे हृदय में स्थित कर दिया है और अब निर्भय प्रभु का नाम जपती रहती हैं।
47मेरा निवास संसार रूपी पहाड़ में है, पर मुझे नामामृत पान की बहुत प्यास लगी हुई है। अब जब मैं देखती हूँ तो मेरा प्रभु मुझे कहीं दूर नहीं लगता।
48मैंने मन में नाम-सिमरन करके अपनी प्यास बुझा ली हैं और नामामृत का पाने कर लिया है।
49हर कोई जीव परमात्मा से नाम दान की कामना करता है, लेकिन यदि उसे मंजूर हो तो ही वह देता है।
50वह हरेक जीव को गुरु द्वारा ही नाम देता है और उसकी प्यास बुझा देता है। ३० ॥
51मैं परमेश्वर को ढूंढती हूँढती फिरती रही और देखा कि अनेक लोग संसार के तट पर गिर रहे हैं।
52पापों के भार से भरे हुए लोग तो संसार-सागर में गिर गए लेकिन पापों के भार से मुक्त जीव पार हो गए।
53जिन्हें अमर परमात्मा मिल गया है, मैं उन पर बलिहारी जाता हैं।
54मैं उन भक्तजनों की चरण-धूलि में स्नान करती रहें, मुझे उनकी संगति में अपने साथ मिला लो।
55मैंने अपना मन गुरु को सौंपकर निर्मल नाम पा लिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं