सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 931 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1वही विधाता है और वही मन-तन प्रदान करता है।

2मन एवं मुख में वह विधाता ही विद्यमान है।

3प्रभु ही जगत् का जीवन है और उसके अलावा अन्य कोई नहीं।

4हे नानक ! जो प्रभु-नाम में लीन रहता है, उसकी ही कीर्ति होती है॥ ६ ॥

5जो हितकारी राम का नाम जपता रहता है,

6वह मन को मारकर जगत् रूपी रणभूमि में डटकर जूझता है और

7दिन-रात परमात्मा के रंग में लीन रहता है।

8ऐसा व्यक्ति तीनों लोकों एवं चारों युगों में लोकप्रिय हो जाता है।

9जिसने भगवान को समझ लिया है, वह उस जैसा ही हो जाता है।

10उसका मन निर्मल एवं शरीर सफल हो जाता है और

11एक श्रद्धा भावना से राम उसके हृदय में बसा रहता है।

12उसके अन्तर में शब्द स्थित हो जाता है और सत्य में ही लगन लगी रहती है ॥ १० ॥

13मन में रोष नहीं करना चाहिए, नामामृत का पान करना चाहिए, चूंकि किसी ने भी इस संसार में नहीं रहना।

14राजा, महाराजा एवं भिखारी किसी ने भी दुनिया में नहीं रहना और चारों युगों में जन्म-मरण का चक्र पड़ा रहता है।

15यह कहने पर भी कि मैं सदा यहाँ ही रहूँगा, कोई यहाँ नहीं रहता। फिर मैं किसके पास विनती करूँ ?

16राम नाम एक शब्द ही जीव का उद्धारक है और गुरु ही बुद्धि एवं प्रतिष्ठा देता है॥ ११॥

17लोक लाज में मरने वाली जीव-स्त्री की लाज ही मर गई है और अब वह घूंघट खोल कर चलती है।

18उसकी अविद्या रूपी सास माया बावली हो गई है और सिर से माया रूपी सास का डर दूर हो गया है।

19उसके प्रभु ने प्रेम एवं चाव से उसे अपने पास बुला लिया है, उसके मन में शब्द द्वारा आनंद हो गया है।

20वह अपने लाल प्रभु के प्रेम में रंग गई है, जिससे उसके चेहरे पर लाली आ गई है। वह गुरु द्वारा निश्चिन्त हो गई है॥ १२॥

21नाम रूपी रत्न का जाप ही सच्चा लाभ है।

22लालच, लोभ एवं अहंकार्.

23निंदा, खुशामद, छेड़छाड़ एवं चुगली सब बुरे कार्य हैं।

24इन बुरी आदतों के कारण मनमुख जीव अंधा, मूर्ख एवं गंवार हो गया है।

25जीव तो जग में नाम रूपी पाने लाभ के लिए आया था

26परन्तु माया का मजदूर बनकर माया द्वारा ठग कर जगत् से खाली हाथ लौट जाता है।

27हे नानक ! सच्चा लाभ केवल प्रभु नाम रूपी पूंजी प्राप्त करने से ही होता है।

28सच्चा पातशाह प्रभु उसे सच्ची प्रतिष्ठा प्रदान करता है। ॥१३॥

29जगत् में जन्म लेकर जीव यम के मार्ग में पड़कर बर्बाद हो रहा है और

30मोह-माया को नाश करने के लिए उसमें समर्था नहीं।

31जिस नीच व्यक्ति के घर में बहुत सारा धन होता है तो

32अमीर-गरीब दोनों ही उसके धन को देखकर झुककर उसे प्रणाम करते हैं।

33जिसके पास बेशुमार धन होता है, वह मूर्ख भी चतुर माना जाता है।

34भक्तिविहीन होकर समूचा जगत् बावला बनकर इधर-उधर भटक रहा है।

35परन्तु एक ईश्वर ही सब जीवों में विद्यमान है,

36वह जिस पर अपनी कृपा करता है, उसके मन में प्रगट हो जाता है॥ १४॥

37युग-युगांतरों से संसार को बनाने वाला ईश्वर सदैव स्थिर है, वैर से रहित है

38प्रेमस्वरूप वह जन्म-मरण के चक्र से रहित है और दुनिया के धंधों से मुक्त है।

39जो कुछ भी दिखाई देता है, वह उसका ही रूप है।

40वह स्वयं ही पैदा करता है और स्वयं ही प्रत्येक हदय में स्थित है।

41वह स्वयं ही अगोचर है और उसने सारी दुनिया को विभिन्न कायों में लगाया हुआ है।

42योग की युक्ति में भी जग का जीवन वह परमेश्वर ही है।

43भक्ति का उत्तम कार्य करने से सच्चा सुख उपलब्ध होता है,

44परन्तु नामविहीन जीव की मुक्ति नहीं हो सकती ॥ १५ ॥

45नाम के बिना जीना अपने शरीर से विरोध करने की तरह है।

46तू प्रभु से क्यों नहीं मिलता ? वह तेरे मन की पीड़ा को दूर कर देगा।

47जीव रूपी पथिक बार-बार जग रूपी पथ पर आता जाता रहता है।

48यह क्या लेकर जगत् में आया है और क्या लाभ प्राप्त करके जा रहा है।

49नाम के बिना हर स्थान में नुक्सान ही होता है।

50उसे नाम रूपी लाभ तभी हासिल होता है, जब परमात्मा उसे सूझ प्रदान करता है।

51सच्चा व्यापारी तो प्रभु-नाम का ही वाणिज्य एवं व्यापार करता है,

52फिर नाम के बिना जीव कैसे शोभा प्राप्त कर सकता है?॥ १६॥

53वही सच्चा ज्ञानी है, जो परम-सत्य के गुणों का विचार करता है।

54गुणों में ही उसे ज्ञान प्राप्त होता है।

55संसार में कोई विरला मनुष्य ही है जो गुणों के दाता परमेश्वर का ध्यान करता है।

56गुरु के उपदेश द्वारा ही नाम-स्मरण की सच्ची करनी हो सकती है।

57अगम्य, मन-वाणी से परे परमेश्वर का सही मूल्य नहीं ऑका जा सकता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं