सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 930 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji

1ऑकार शब्द से ही सबका उद्धार हुआ है और

2ऑकार से गुरुमुख संसार-सागर से तैर गए हैं।

3‘ओम्’ अक्षर का विचार सुनो;

4ओम् अक्षर पृथ्वी, आकाश, पाताल तीनों लोकों का सार है॥ १॥

5हे पांडे ! जरा सुन; क्यों जंजाल में फँसाने वाली बातें लिख रहा है ?

6गुरुमुख बनकर राम नाम लिखो ॥ १॥ रहाउ ॥

7स-समस्त जगत् परमात्मा ने सहज स्वभाव ही उत्पन्न किया है और तीनों लोकों में उसकी ही ज्योति समाई हुई है।

8नाम रूपी वस्तु गुरु के माध्यम से ही प्राप्त होती है और इन नाम रूपी माणिक्य एवं मोतियों को चुन लेना चाहिए।

9जो व्यक्ति बार-बार वाणी पढ़कर उसे समझने का प्रयास करता है, वह इस तथ्य को बूझ लेता है केि अन्तर्मन में परम-सत्य परमेश्वर ही स्थित है।

10गुरुमुख सबमें ईश्वर को ही देखता है और सत्य का ही चिंतन करता है, सत्य के बिना समूचा जगत् नाशवान् है॥ २॥

11ध-धर्म की नगरी सत्संग में ही जीव धर्म को धारण करता है, यही उसके लिए गुणकारी है और मन धैर्यवान बना रहता है।

12जिनके मुख मस्तक पर संतों-महापुरुषों की चरण-धूलि पड़ती है, उनका पत्थर जैसा मन भी स्वर्ण बन जाता है।

13वह परमेश्वर धन्य है, जन्म-मरण से रहित है एवं हर प्रकार से पूर्ण सत्य है।

14उस कर्ता-प्रभु की गति वह प्रभु स्वयं ही जानता है या शूरवीर गुरु जानता है॥ ३ ॥

15द्वैतभाव में फंसकर जीव ने अपना ज्ञान गंवा दिया है और माया रूपी विष को खाकर घमण्ड में ही नष्ट हो गया है।

16उसे गुरु की वाणी के कीर्तन का आनंद नहीं आता और न ही उसे गुरु के वचन सुनने अच्छे लगते हैं, इस प्रकार उसने गहन-गंभीर सत्य को गंवा दिया है।

17जिसे गुरु ने सत्य का उपदेश सुनाया है, उसने नामामृत पा लिया है और उसके मन-तन को सत्य ही सुखद लगता है।

18परमात्मा ही गुरु है, वह स्वयं ही नाम की देन देता है और उसने स्वयं ही नामामृत का पान करवाया है॥ ४ ॥

19हर कोई कहता है कि परमात्मा एक है, किन्तु जीव अभिमान एवं घमण्ड में लीन रहता है।

20जो व्यक्ति अंतर्मन व बाहर एक ईश्वर को पहचान लेता है, इस तरह वह सच्चे घर को जान लेता है।

21परमात्मा हमारे निकट ही है, उसे कहीं दूर मत समझो, सारी सृष्टि में एक ईश्वर का ही निवास है।

22समूचे विश्व में ऑकार का ही प्रसार है, अन्य कोई नहीं है। हे नानक ! एक ईश्वर ही सब में समाया हुआ है॥ ५ ॥

23ईश्वर को किस प्रकार मन में बसाकर रखूं, क्योंकि यह मन तो अभिमानी बना हुआ है और उसकी महिमा को तौला नहीं जा सकता।

24हे माया के मतवाले प्राणी ! माया ने तेरे मुँह में झूठ रूपी ठगौरी डाली हुई है।

25लालच एवं लोभ में फँसकर जीव आवश्यकताओं पर मोहताज होकर ख्वार होता है और फिर पछताता रहता है।

26यदि एक परमेश्वर की स्तुति-वंदना की जाए तो उसकी गति का अनुमान लगाया जा सकता है और आवागमन से मुक्ति हो जाती है॥ ६॥

27एक परमेश्वर ही आचार, रंग रूप में कार्यशील है और

28पवन, पानी एवं अग्नि में भी वही स्थित है।

29तीनों लोकों में भी एक प्रभु जीव रूपी भंवरा बनकर भटकता रहता है और

30उसे समझने-बूझने वाला ही शोभा का पात्र बनता है।

31ज्ञान-ध्यान को हासिल करने वाला दुख-सुख में एक समान रहता है,

32कोई विरला ही गुरुमुख बनकर नाम प्राप्त करता है।

33जिस पर वह कृपा करता है, उसे ही नाम देता है और वह सुख प्राप्त करता है।

34वह गुरु के द्वारा उसे अपना नाम कहकर सुनाता है॥ ७॥

35धरती एवं आकाश में उसकी ही ज्योतेि का उजाला है और

36तीनों लोकों में जगद्गुरु परमेश्वर ही मौजूद है।

37वह स्वयं ही प्रगट होकर भक्तों को अपने स्वरूप के दर्शन करवाता है और

38कृपा करके वह स्वयं ही हृदय घर में आता है।

39उसकी अनुकंपा से अमृत रस की धारा जीभ पर पड़ती रहती है।

40उसका उत्तम शब्द मानव-जीवन को सुन्दर बनाने वाला है।

41जो व्यक्ति परमात्मा के भेद को जान लेता है,

42उसे ज्ञान हो जाता है कि ईश्वर स्वयं ही कर्ता है और स्वयं ही देव है॥ ८॥

43जब नाम रूपी सूर्योदय होता है तो विकार रूपी असुरों का संहार हो जाता है।

44जो ऊँची दृष्टि करके शब्द का चिंतन करता है,

45उसे तीनों लोकों एवं सृष्टि के आदि-अंत तक परमात्मा ही रक्षक नजर आता है।

46वह स्वयं ही सबकुछ करता है, स्वयं ही अपनी लीला की कथा करता है और स्वयं ही सुनता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं