सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 92 · Siree Raag · Bhagat Kabeer Ji

1हे प्रभु! आप ने ही इस तरह जगत् को भ्रम में डाला हुआ है।

2हे प्रभु ! माया ने जगत् को अपने मोह में फँसाया हुआ है, फिर जगत् इस भेद को कैसे समझ सकता है?॥ १॥ रहाउ ॥

3कबीर जी कहते हैं कि हे प्राणी ! तू पापों का विषय-रस त्याग दे, क्योंकि इनकी संगति से तुम निश्चित ही मर जाओगे।

4हे नश्वर प्राणी ! राम नाम का भजन करो, क्योंकि वहीं अनन्त जीवनदायक वाणी है। इस विधि से तुम भयानक सागर से पार हो जाओगे ॥ २ ॥

5जब भगवान को उपयुक्त लगता है तो ही जीव का उससे प्रेम होता है।

6उसके मन में से दुविधा में डालने वाला भ्रम दूर हो जाता है।

7फिर मन में सहज अवस्था उत्पन्न होने से उसकी सोई हुई ज्ञान बुद्धि जाग जाती है।

8गुरु की कृपा से उसके अन्तर्मन में भगवान से सुरति लग जाती है॥ ३॥

9परमात्मा की संगति में रहने से जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।

10ईश्वर की आज्ञा को पहचान कर ही जीव का उससे मिलन हो जाता है॥ १॥ रहाउ दूसरा ॥

11श्रीरागु त्रिलोचन का ॥

12हे प्राणी ! तेरे मन में मोह-माया की इतनी आसक्ति है कि तुझे बुढ़ापा और मृत्यु का भय भी भूल गया है।

13जैसे कमल का फूल जल में खिलता है, वैसे ही तुम अपने परिवार को देखकर प्रसन्न होते हो। परन्तु हे कपटी मानव ! तुम पराई-नारी को देखते रहते हो॥१॥

14जब बलवान यमदूत आते हैं तो मैं उनके समक्ष टिक नहीं सकता। कोई विरला ही संत है जो इस जगत् में आकर यह बात कहता है।

15हे मेरे प्रभु ! मुझे दर्शन दीजिए और अपनी भुजाएँ गले में डालकर मुझसे भेंट करो।

16हे मेरे राम ! मुझे मिलो और बन्धन से मुक्त करो ॥१॥ रहाउ ॥ हे प्राणी ! तूने विभिन्न प्रकार के भोग-विलासों एवं राजकीय शान-शौकत में पड़कर ईश्वर को विस्मृत कर दिया है तथा इस संसार सागर में पड़कर तुम ध्यान करते हो कि तुम अमर हो गए हो।

17तुझे माया ने छल लिया है इसलिए तू प्रभु को स्मरण ही नहीं करता।

18हे आलसी प्राणी ! तूने अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया है॥ २॥

19हे प्राणी ! मरणोपरांत तुझे यमपुरी जाते वक्त बहुत ही भयानक अंधकारमय मार्ग से चलना पड़ेगा। उस यमपुरी में सूर्य एवं चन्द्रमा का भी प्रवेश नहीं।

20जब प्राणी संसार को त्याग देता है, तब वह माया के मोह को भूल जाता है।॥३॥

21आज मेरे मन में यमराज प्रगट हो गया था और मैंने उसे नेत्रों से देख लिया है।

22वहाँ यमराज के शक्तिशाली दूत लोगों को अपने हाथों से दलन करते हैं और मैं उनके समक्ष टिक नहीं सकता ॥४॥

23हे नारायण ! जब कोई मुझे उपदेश करता है तो मुझे यूं लगता है कि जैसे तुम वनों एवं घास के तृणों में भी विद्यमान हो।

24भक्त त्रिलोचन जी प्रार्थना करते हैं कि हे मेरे राम ! तुम स्वयं ही सबकुछ जानते हो ॥ ५ ॥ २ ॥

25श्री रागु भगत कबीर जीउ का ॥

26हे पण्डित ! परमात्मा की माया की एक आश्चर्यजनक बात सुनो। उस बारे अब कुछ कहा नहीं जा सकता,

27उसने देवते, मनुष्य, स्वर्ग के गण-गंधर्व सभी मोहित कर रखे हैं और उसने तीनों लोकों आकाश, पाताल एवं पृथ्वी को जकड़ा हुआ है। ॥१॥

28हे मेरे राम ! तेरी वीणा बज रही है, जिससे अनहद नाद उत्पन्न हो रहा है।

29तेरी कृपा-दृष्टि से भक्तों की उस नाद में सुरति लगती है ॥१॥ रहाउ॥

30(दशम द्वार पर मदिरा खींचने की भट्टी है, इड़ा-पिंगला दोनों नलकियाँ हैं और शुद्ध अन्तःकरण मदिरा भरने के लिए स्वर्ण-पात्र है।) मुझे दशम द्वार की भट्ठी सहित एक नलकी अंदर खींचने वाली और एक नलिका बाहर फॅकने वाली के अन्तःकरण का स्वर्ण-पात्र प्राप्त हुआ है।

31उस पात्र में निर्मल हरि रस की धारा स्रवित होती है। यह बहने वाला हरि रस अन्यों रसों से श्रेष्ठ रस है ॥ २॥

32एक बहुत ही सुन्दर बात बनी है कि प्रभु ने श्वास रूपी पवन को हरि रस पान करने के लिए प्याला बना दिया है।

33तीनों लोकों में एक प्रभु ही योगी रूप में निवास कर रहा है। बताओ, उस प्रभु के अतिरिक्त इस जगत् का राजा अन्य कौन है? ॥ ३॥

34भगत कबीर जी कहते हैं कि मेरे अन्तर्मन में पुरुषोत्तम प्रभु का ऐसा ज्ञान प्रगट हो गया है कि मैं प्रभु के प्रेम में मग्न हो गया हूँ।

35शेष सारी दुनिया भ्रम में भूली हुई है, मैं तो समस्त रसों के स्रोत प्रभु नाम में मग्न रहता हूँ ॥४॥३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं