सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 929 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1ईश्वर ने स्वयं ही यह सत्य बताने के लिए साधुओं को संसार में भेजा है कि वह तुमसे कहीं दूर नहीं।

2हे नानक ! सब भ्रम एवं भय मिट गए हैं, एक राग ही सब जीवों में रमण कर रहा है॥ २ ॥

3छंद॥

4मार्गशीर्ष एवं पौष के महीनों में शीतल शिशिर ऋतु आई है और प्रभु अन्तर्मन में प्रगट हो गया है।

5उसके दर्शन करके सारी जलन दूर हो गई है और माया के सब बन्धन नाश हो गए हैं।

6सेवक ने हरि-चरणों की सेवा की है और प्रत्यक्ष प्रभु से मिलकर सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं।

7सब ने हार श्रृंगार सहित आनंद से उस अलक्ष्य, रहस्यातीत, परमात्मा का ही गुणगान किया है।

8जो गोविंद की प्रेम-भक्ति की कामना करते हैं, यम भी उन्हें तंग नहीं करता।

9नानक विनती करते हैं कि जिस जीव-स्त्री को प्रभु ने साथ मिला लिया है, उसका प्रेम वियोग नहीं होता ॥ ६॥

10श्लोक॥

11जिस सुहागिन ने पति-प्रभु को पा लिया है, उसका मन कभी विचलित नहीं होता।

12हे नानक ! संतों के संयोग से ही मित्र-प्रभु उसके हृदय-घर में प्रगट हो गया है॥ १॥

13प्रियतम के संग ही आनंद, विनोद एवं संगीत इत्यादि सब खुशियां मिलती हैं।

14हे नानक ! हरि-नाम का जाप करके मनोवांछित फल प्राप्त हो गया है॥ २ ॥

15छंद ॥

16हेमंत ऋतु मन को बहुत अच्छी लगती है, माघ-फाल्गुन के महीने बड़े गुणवान् हैं।

17हे मेरी सखी-सहेली, प्रभु हृदय-घर में आ गया है, इसलिए उसका मंगलगान करो।

18मन में उसका ध्यान किया है और हृदय-घर में वह प्रभु जी आए हैं और मेरी हृदय रूपी सेज सुन्दर एवं सुहावनी हो गई है।

19वन, तृण एवं तीनों लोक सब खुशहाल हो गए हैं और उसके दर्शन करके मोहित हो गई हूँ।

20मेरा स्वामी मुझे मिल गया है, मेरी कामना पूरी हो गई है, चूंकि मन में उसके निर्मल नाम-मंत्र का ही जाप किया है।

21नानक विनती करते हैं कि नित्य आनंद प्राप्त करो, चूंकि श्रीधर हरि रूपी पति मिल गया है॥ ७ ॥

22श्लोक ॥

23संत ही जीवों के सहायक हैं, जो संसार-सागर से पार करवाने वाले हैं।

24हे नानक ! जो प्रभु-नाम से प्रेम करता है, वही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है॥ १॥

25जिन्होंने ईश्वर को पहचान लिया है, वे संसार से मुक्त हो गए हैं, वही शूरवीर एवं पराक्रमी हैं।

26हे नानक ! मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ, जो भगवान का जाप करके पार हो गए हैं।॥ २॥

27छंद॥

28सब के ऊपर भगवान के चरण विराजमान हैं और उनका सारा दुख-क्लेश मिट गया है।

29जिनके हृदय में भगवान की भक्ति का प्रवेश हो गया है, उनका आवागमन का दुख मिट गया है।

30वे हरि-रंग में लीन रहकर सहज ही मस्त रहते हैं और तिल मात्र समय के लिए भी उन्हें प्रभु मन से नहीं भूलता।

31वे अपना अहंत्व त्यागकर सर्वगुणसम्पन्न जगदीश्वर के चरणों की शरण में आ गए हैं।

32गुणों के भण्डार, श्रीरंग, स्वामी, सृष्टि के आदि उस गोविन्द को हमारा शत् शत् नमन है।

33नानक विनती करते हैं कि हे स्वामी ! मुझ पर दया करो, युगों-युगान्तरों से एक तेरा ही अस्तित्व है॥ ८॥ १॥ ६॥ ८ ॥

34रामकली महला १ दखणी ओअंकारु

35ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

36ऑकार से ब्रह्मा की उत्पति हुई,

37जिसने चित्त में ऑकार का ही ध्यान किया,

38अनेक पर्वत एवं युग ऑकार से पैदा हुए और

39ऑकार ने वेदों का निर्माण किया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं