सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 928 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1उस गोविन्द के गुण अमूल्य हैं, वह बड़ा सुन्दर, चतुर, बुद्धिमान एवं सर्वज्ञाता है।

2अहोभाग्य से उसे प्राप्त किया है, दुख दूर हो गया है और प्रत्येक आशा पूर्ण हो गई है।

3नानक विनती करते हैं कि हे स्वामी ! तेरी शरण में आकर मेरी यम की पीड़ा मिट गई है।२॥

4श्लोक ॥

5साधु-संगति के बिना भ्रम में फँसकर अनेक कर्म करती हुई जीव-स्त्री ने सारी जिंदगी बर्बाद कर दी।

6हे नानक ! पूर्व कर्मो के कर्म-लेख अनुसार माया ने उसे अपने मोह के कोमल बन्धनों में बांध लिया है॥ १॥

7जब परमात्मा को मंजूर होता है, वह अपने साथ मिला लेता है और स्वयं ही बिछोड़ भी देता है।

8हे नानक ! उस प्रभु की शरण में आओ, जिसका सारी दुनिया में बड़ा प्रताप है॥ २ ॥

9छंद॥

10ग्रीष्म ऋतु बड़ी कठिन होती है और ज्येष्ठ-आषाढ़ के महीने में बड़ी गर्मी पड़ती है।

11दुहागिन जीव-स्त्री को प्रेम का बिछोड़ा दुखी करता है, चूंकि राम रूपी पति उस पर दृष्टि नहीं करता।

12उसे पति-प्रभु नजर नहीं आता और वह आहें भरकर विलाप करती है। उसके बड़े घमण्ड ने उसका जीवन बर्बाद कर दिया है।

13वह जल के बिना मछली की तरह तड़पती है और माया के संग मोह के कारण उसका पति उससे रुठा हुआ है।

14वह पाप करके योनियों में भयभीत होती है और यम उसे पीड़ित करता है।

15नानक विनती करते हैं कि हे प्रभु ! मैंने तेरी ओट ली है, मेरी रक्षा करो और सब कामनाएँ पूरी करो ॥ ३॥

16श्लोक॥

17मेरी प्रियतम प्रभु से श्रद्धा लग गई है और तिल मात्र समय के लिए भी उससे रहा नहीं जाता।

18हे नानक ! वह सहज-स्वभाव ही मेरे मन-तन में बसा हुआ है। १॥

19मेरे जन्म-जन्मांतर के मित्र साजन-प्रभु ने मुझे हाथों से पकड़ लिया है।

20हे नानक ! प्रभु ने शुभचिन्तक बनकर मुझे अपने चरणों की दासी बना लिया है॥ २ ॥

21छंद ॥

22वर्षा ऋतु बड़ी सुखदायक है और सावन -भादों के महीनों में आनंद बना रहता है।

23मेघ उमड़-उमड़ कर वर्षा कर रहे हैं और उन्होंने सरोवरों एवं भूमि को सुगन्धित जल से भर दिया है।

24प्रभु सब स्थानों में जल की तरह व्याप्त है और नौ निधियाँ देने वाले हरि-नाम से हृदय-घर भर गया है।

25अन्तर्यामी स्वामी का सिमरन करने से सभी कुलों का उद्धार हो जाता है।

26जो प्रियतम के प्रेम में जाग्रत रहते हैं, उन्हें कोई पाप प्रभावित नहीं करता, क्योंकि कृपालु परमेश्वर सदैव क्षमावान् है।

27नानक विनती करते हैं कि उसने पति-प्रभु को प्राप्त कर लिया है, जो सदा ही उसके मन को भाता है॥ ४ ॥

28श्लोक।

29मैं उसी की आशा एवं तीव्र लालसा में भटक रही हूँ कि कब परमात्मा के मुझे दर्शन होंगे।

30नानक कहते हैं कि क्या कोई ऐसा साजन संत है, जो प्रभु से मिलाने वाला हो।॥ १॥

31प्रभु-मिलन के बिना मन में शान्ति उत्पन्न नहीं होती और तिल भर समय के लिए भी नहीं रहा जाता।

32हे नानक ! साधु की शरण में आने से ही आशा पूरी होती है॥ २॥

33छंद ॥

34आश्विन एवं कार्तिक के महीनों में जब शरद् ऋतु का आगमन होता है तो मन में हरि-मिलन की लालसा पैदा होती है।

35उसके दर्शन करने के लिए खोज में भटक रही हूँ कि कब गुणों का भण्डार परमात्मा मिलेगा।

36प्रिय-प्रभु के बिना सारे सुख फीके हैं और हार-कंगन सब धिक्कार योग्य है ।

37सुन्दर, बुद्धिमान एवं चतुर प्रभु सब कुछ जानता है और उसके बिना ऐसे हो गई हूँ जैसे सांसो के बिना मृतक शरीर होता है।

38मेरे मन में प्रभु-मिलन की ही लालसा है उधर दसों दिशाओं में देखती रहती हूँ।

39नानक विनती करते हैं कि हे गुणों के भण्डार परमेश्वर ! अपने साथ मिला लो॥ ५ ॥

40श्लोक॥

41मन-तन में शान्ति उत्पन्न हो गई है, सारी जलन बुझ गई है और ह्रदय शीतल हो गया है।

42हे नानक ! पूर्ण प्रभु मिल गया है, जिससे द्वैतभाव एवं भ्रांति नाश हो गई है॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं