सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 927 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1केवल परमेश्वर का आसरा ग्रहण करो, अपना जीवन भी उस पर न्योछावर कर दो और उस पर ही आशा रखो।

2जो साधुओं की संगति में प्रभु-नाम में लीन रहते हैं, वे सभी संसार-सागर से तैर जाते हैं।

3इस प्रकार उनका जन्म-मरण एवं सारे विकार छूट जाते हैं और पुनः कोई कलंक नहीं लगता।

4नानक पूर्ण परमेश्वर पर कुर्बान जाता है, जिसका सुहाग सदा अटल है॥ ३॥

5श्लोक।

6धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रूपी मुक्ति पदार्थ ईश्वर देने वाला है।

7हे नानक ! जिसके माथे पर कर्म लेख लिखा होता है, उसके सब मनोरथ पूरे हो जाते हैं।॥ १॥

8छंद ॥

9जब से निरंजन प्रभु मिला है, तब से सब कामनाएँ पूरी हो गई हैं।

10अहोभाग्य से प्रभु हृदय-घर में प्रगट हो गया है, जिससे मन में आनंद ही आनंद हो गया है।

11पूर्व जन्म में किए शुभ कर्मो के कारण हृदय-घर में प्रभु आए हैं, जिसकी उपमा व्यक्त नहीं की जा सकती।

12वह सहज सुख प्रदान करने वाला दाता बेअंत एवं पूर्ण है, मैं कौन-सी जिव्हा से उसकी महिमा बयान करूं ?

13उसने स्वयं ही साथ मिलाकर गले से लगा लिया है, उसके अलावा अन्य कोई अवलम्ब नहीं।

14नानक सदा ही सृजनहार पर बलिहारी जाता है, जो सब जीवों में समा रहा है।४॥ ४॥

15रागु रामकली महला ५ ॥

16हे सखी ! मधुर-सुरीले स्वर में यशगान करो और केवल परमेश्वर का ही ध्यान करो।

17हे मेरी सखी ! तुम सतगुरु की सेवा करो और मनोवांछित फल पा लो।

18रामकली महला ५ रुती सलोकु

19ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

20परब्रह्म-प्रभु की वन्दना करो और साधुओं की चरण-धूल की ही आकांक्षा करो।

21अपना अहम् छोड़कर भगवान का भजन करो, हे नानक ! वह प्रभु विश्वव्यापक है॥ १॥

22सर्व पाप काटने वाला, भयनाशक प्रभु ही सुखों का सागर है।

23हे नानक ! नित्य दीनदयाल एवं दुखनाशक ईश्वर का ध्यान करना चाहिए।२॥

24छंद ॥

25हे भाग्यशालियो ! परमात्मा का यशोगान करो। हे भगवंत ! अपने भक्तजनों पर कृपा करो।

26हर ऋतु, महीने, मुहूर्त एवं घड़ी शोभावान ईश्वर के गुणों का उच्चारण करें।

27जो एकाग्रचित होकर परमात्मा का ध्यान करते हैं, उसके गुणों के रंग में लीन रहते हैं, वही व्यक्ति भाग्यवान् हैं।

28उनका जन्म सफल हो गया है, जिन्होंने प्रभु को पा लिया है।

29कोई दान पुण्य एवं कोई भी धर्म-कर्म हरि-नाम के तुल्य नहीं है, वह सर्व पापों को नाश करने वाला है।

30नानक विनती करते हैं कि हे प्रभु ! तेरा सिमरन करके अपना जीवन बिता दूँ और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाऊँ॥ १॥

31श्लोक।

32उस अगम्य-अगोचर को पाने का ही उद्यम कर रहा हूँ और प्रभु के चरण-कमल को प्रणाम है।

33नानक कहते हैं कि हे ईश्वर ! मैं वही बात कहता हूँ जो तुझे अच्छी लगती है और तेरा नाम ही मेरा जीवनाधार है॥ १॥

34हे सज्जनो, संतों की शरण ग्रहण करो और अनंत स्वामी का चिंतन करो।

35हे नानक ! भगवंत का जाप करने से नीरस जीवन खुशहाल हो जाता है॥ २॥

36छंद॥

37वसंत ऋतु आनंदमयी बन गई है और चैत्र-वैशाख का महीना सुखदायक बन गया है।

38प्रभु को मिलकर मन-तन एवं जीवन सॉसें प्रसन्न हो गई हैं।

39हे सखी! अविनाशी पति-प्रभु हृदय-घर में आ बसा है, जिससे आनंद उत्पन्न हो गया है और उसके चरण-कमल के स्पर्श से मन प्रफुल्लित हो गया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं