गुरु ग्रंथ साहिब 926 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji
1नानक विनती करते हैं किं प्रभु ने कृपा की है, जिससे पूर्ण सतगुरु प्राप्त हो गया है॥ २॥
2प्रभु के साधुजनों के संग मिलकर रहना चाहिए और भगवान का भजन-कीर्तन सुनना चाहिए।
3हे दयालु प्रभु, हे दामोदर, हे माधव ! तेरी महिमा का अन्त नहीं पाया जा सकता।
4हे दीनदयाल ! तू दुखनाशक, शरण देने में समर्थ एवं सब दोष निवारण करने वाला है।
5तेरा नाम जपने से मोह, शोक एवं विषम विकारों से उद्धार हो जाता है।
6हे मेरे प्रभु! सब जीव तेरे ही पैदा किए हुए हैं, ऐसी कृपा करो कि मैं सबकी चरण-धूलि बना रहूँ।
7नानक विनती करते हैं कि दया करो, चूंकि तेरा नाम जपकर ही जीना है॥ ३॥
8प्रभु ने भक्तजनों की रक्षा करके उन्हें अपने चरणों से लगा लिया है।
9वे आठों प्रहर प्रभु का सिमरन करते रहते हैं और केवल उसके नाम का ही भजन करते हैं।
10सो प्रभु का भजन करके वे संसार-सागर से पार हो जाते हैं और उनका आवागमन मिट जाता है।
11परमात्मा का भजन-कीर्तन करने से ही उन्हें कल्याण एवं सदैव सुख मिलता है और प्रभु की रज़ा ही उन्हें मीठी लगी है।
12पूर्ण सतगुरु से मिलकर उनकी हर प्रकार की आशा एवं मनोकामनाएं पूरी हो गई हैं।
13नानक विनती करते हैं कि जिन्हें प्रभु ने अपने साथ मिला लिया है, फिर उन्हें कोई दुख-दर्द प्रभावित नहीं करता ॥ ४॥ ३॥
14रामकली महला ५ छंत ॥
15श्लोक ॥
16प्रभु के चरण-कमल की शरण में आकर आनंद-मंगल रूपी गुणगान करना चाहिए।
17हे नानक ! प्रभु की आराधना करो, चूंकि वह हर विपत्ति का निवारण करने वाला है॥ १॥
18छंद॥
19प्रभु प्रत्येक विपत्ति का निवारण करने वाला है और उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं।
20सदैव परमेश्वर का सिमरन करना चाहिए क्योंकि समुद्र, पृथ्वी एवं नभ में वही स्थित है।
21उसे एक क्षण भर भी मन से भुलाना नहीं चाहिए, जो समुद्र, पृथ्वी एवं गगन सब जगह मौजूद है।
22वह दिन भाग्यशाली है, जब गुरु-चरणों में मन लगा है, हे जगदीश्वर ! तू सर्वगुण सम्पन्न है।
23सेवक बनकर दिन-रात उसकी उपासना करते रहो, जो उसे मंजूर है, वही होता है।
24हे सुखों के दाता ! नानक तुझ पर बलिहारी जाता है, क्योंकि तेरी कृपा से मन-तन में प्रकाश होता है। १॥
25श्लोक।
26भगवान का सिमरन करने से मन-तन सुखी हो जाता है और सब परेशानियाँ दूर हो जाती हैं।
27हे नानक ! ईश्वर का आसरा लो, जो हर संकट से छुटकारा दिलाने वाला है॥ १॥
28छंद॥
29दयालु नारायण ने सब भय एवं संकट काट दिए हैं।
30हमने आनंद से प्रभु का गुणगान किया है, वह दीननाथ एवं सबका प्रतिपालक है।
31एक अच्युत परमपुरुष परमेश्वर ही हमारा प्रतिपालक है और उसके संग मन लीन हो गया है।
32जबसे उसके चरणों में अपना माथा टेका एवं हाथों से प्रार्थना की है, उसने मुझे अपने साथ मिला लिया है और रात-दिन मोह माया से जाग्रत रहता हूँ।
33यह प्राण, शरीर, घर, स्थान, तन, यौवन एवं धन संपति परमात्मा की देन है।
34नानक सर्वदा उस पर बलिहारी जाता है, जो सब जीवों का प्रतिपालक है॥ २ ॥
35श्लोक।
36यह रसना ‘हरि-हरि' ही जपती है और गोविंद के गुणों का बखान करती है।
37हे नानक ! एक परमेश्वर की शरण ले ली है, जो अन्तिम समय छुटकारा दिलाता है।॥ १॥
38छंद ॥
39सो स्वामी प्रभु हम सबका रक्षक है, इसलिए उसके ऑचल में लग जाओ।
40अपने मन की मति त्याग कर साधुजनों की संगति में दयालु परमात्मा का भजन करो।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं