गुरु ग्रंथ साहिब 924 · Raag Raamkalee · Bhatt (Baba) Sundar
1जैसे सतिगुरु अमरदास जी ने कहा, वैसे ही गुरु-शिष्यों ने उनकी रज़ा को मान लिया।
2सर्वप्रथम सतिगुरु अमरदास जी का अपना पुत्र बाबा मोहरी उनके सम्मुख हुआ और सतिगुरु (अमरदास जी) ने उन्हें गुरु रामदास के चरण-स्पर्श करने के लिए कहा और
3उन से गुरु रामदास के चरण-स्पर्श करवाए और सारे ही सिक्ख गुरु रामदास जी के चरणों में आ पड़े, जिनमें अमरदास जी ने अपनी ज्योति स्थापित की थी।
4यदि कोई इर्षा वश गुरु रामदास जी के आगे नहीं था तो सतगुरु ने उसे नम्रतापूर्वक शरण में ले लिया।
5गुरु अमरदास को परमात्मा रज़ा सहर्ष स्वीकार हुई और उन्होंने गुरु रामदास जी को गुरुयाई देकर बड़ाई प्रदान की।
6सुन्दर जी कहते हैं कि हे सज्जनो ! सुनो; गुरु अमरदास जी ने गुरु रामदास को गुरुगद्दी पूरे जगत् को उनके चरणों में डाल दिया।॥ ६॥ १॥
7रामकली महला ५ छंत
8ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
9मेरा साजन प्रभु मेरे निकट ही खड़ा है।
10यह मुझे प्राणों से भी प्रिय है और उसके नयनों से दर्शन कर लिए हैं।
11मैंने अपने प्रेिय को नयनों से देख लिया है जो घट-घट में व्यापक है और मेरा प्रियतम अमृत के सामान मधुर है।
12जिव मन में स्थित प्रियतम का अनुभव नहीं कर सकता और वह मूर्ख तो अपने जीवन लक्ष्य को भी नहीं जानता है।
13माया के नशे में मस्त बना हुआ वह व्यर्थ बातें करता रहता है और भ्रम के कारण प्रभु से उसका मिलन नहीं हो पाता।
14हे नानक ! साजन प्रभु सबके निकट मौजूद है, परन्तु गुरु के बिना उसकी सूझ नहीं होती ॥ १ ॥
15मेरा गोविन्द मेरे प्राणों आधार है।
16सब जीवों को देने वाला दाता बड़ा कृपालु है।
17वह अपरंपार दातार घट-घट सबके अन्तर्मन में शोभा दे रहा है।
18उसने माया रूपी एक दासी बनाई हुई है, उसका सारे जगत् में प्रसार और सब जीवों को उसने मोहित किया हुआ है।
19जिसकी वह रक्षा करता है, वही सत्य कहता है और वही गुरु-शब्द का विचार करता है।
20हे नानक ! जो प्रभु को अच्छा लगता है, उन्हें ही प्रभु प्यारा लगता है॥ २॥
21मुझे अपने प्रभु पर मान है, सच तो यह है केि मुझे प्रभु पर ही मान है।
22मेरा स्वामी प्रभु अन्तर्यामी, चतुर एवं बुद्धिमान है।
23वह सदा ही चतुर, बुद्धिमान, सारी सृष्टि का प्रधान है। उस हरि का नाम अमृत के तुल्य है।
24जिनका भाग्य उज्ज्वल है, वे प्रभु के नामामृत का पान करके तृप्त हो गए हैं।
25उन्होंने उसे प्राप्त किया है, उसका ही ध्यान किया है और सबको उस पर गर्व है।
26हे नानक ! अटल सिंहासन पर विराजमान परमात्मा का दरबार शाश्वत है॥ ३॥
27मेरे प्रभु का मंगलगान सुनो।
28उस प्रभु के घर में अनहद ध्वनि वाला कीर्तन होता रहता है।
29उसके घर अनहद शब्द गूंजता रहता है और नित्य ही कल्याण की बधाई मिलती रहती है।
30सो प्रभु का ध्यान करने से सबकुछ प्राप्त हो जाता है और आवागमन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
31प्रत्येक अभिलाषा पूर्ण हो जाती है और सब लालसाएँ मिट जाती हैं। निर्गुण परमात्मा को गुरु द्वारा पा लो।
32हे नानक ! हृदय-घर में सदैव मेरे प्रभु का मंगलगान सुनना चाहिए॥ ४॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं