गुरु ग्रंथ साहिब 923 · Raag Raamkalee
1रामकली सदु
2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
3समूचे विश्व का दाता ईश्वर ही है, भक्तवत्सल है और तीनों लोकों में स्थित है।
4(गुरु अमरदास जी) शब्द-गुरु द्वारा परम-सत्य में ही लीन रहते थे और परम सत्य के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं जानते।
5वह अन्य किसी को नहीं जानते और गुरु के शब्द द्वारा एक प्रभु-नाम का ही ध्यान करते रहते थे।
6गुरु नानक देव जी और गुरु अंगद देव जी की कृपा से गुरु अमरदास जी ने (भक्ति की) परम पदवी प्राप्त की।
7जब गुरु (अमरदास जी) राम नाम में लीन रहते थे तो उन्हें मृत्यु का आह्यन हो गया और उनकी ज्योति परमज्योति में विलीन हो गई।
8गुरु अमरदास जी ने भक्ति द्वारा उस ईश्वर को पा लिया जो जग में अमर, अटल एवं अडोल ठाकुर है॥१॥
9ज्योति-ज्योत समाने की गुरु (अमरदास जी) को परमात्मा की रज़ा सहर्ष स्वीकार हो गई और वह प्रभु के पास चलने के लिए तैयार हो गए।
10सतिगुरु (अमरदास जी) ने ईश्वर से विनती की कि मेरी तुझसे यही प्रार्थना है कि मेरी लाज रखो।
11हे हरि ! अपने दास की लाज रखो, मुझे अपना पावन नाम दो,
12जो काल एवं यमदूतों को नाश करने वाला है और अन्तिम समय साथी बने।
13जब सतिगुरु (अमरदास जी) ने विनती की तो प्रभु ने उनकी प्रार्थना सुन ली।
14परमात्मा ने कृपा करके सतिगुरु (अमरदास जी) को अपने साथ विलीन कर लिया और कहने लगे कि आप धन्य हैं और मेरी तुझे शाबाश है॥ २॥
15परलोक गमन से पूर्व गुरु (अमरदास जी) ने कहा कि हे मेरे सिक्खो, पुत्रो एवं भाईयो ! मेरी बात सुनो, मेरे प्रभु की यह इच्छा हुई है कि मैं अब उस में विलीन हो जाऊँ।
16गुरु को परमात्मा की रज़ा भा गई है और प्रभु उन्हें शाबाश दे रहा है।
17वही परम भक्त एवं सतिगुरु पुरुष है, जिसे प्रभु की इच्छा सहर्ष स्वीकार हुई हैं।
18उसके मन में अनहद नाद वाले आनंदमयी बाजे बजते रहते हैं और प्रभु उसे स्वयं अपने गले से लगा लेता है।
19(सतिगुरु ने कहा कि) आप मेरे पुत्र, भाई एवं परिवार हो और अपने मन में यह विचार करके देख लो किं
20ईश्वर के दरबार में लिखा हुक्म टाला नहीं जा सकता, अतः अब गुरु (अमरदास जी) प्रभु के पास जा रहे हैं।॥ ३॥
21सतगुरु अमरदास जी को जैसे उपयुक्त लगा, उन्होंने अपने परिवार को अपने पास बुला लिया और कहा कि
22मेरे परलोक गमन के पश्चात् कोई भी रोना मत, मुझे रोना बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा।
23जिसे अपने मित्र की प्रतिष्ठा अच्छी लगती है, वह मित्र के सम्मान पर प्रसन्न होता है, जिसे प्रभु-दरबार में शोभा मिल रही है, उसके शुभचिंतकों को रोने की बजाय खुश होना चाहिए।
24हे मेरे पुत्रो एवं भाईयो ! आप विचार करके देख लो, परमात्मा सतिगुरु को शोभा का पात्र बना रहा है।
25सतिगुरु अमरदास जी ने अपने जीते जी ही श्री (गुरु) रामदास जी को गुरुगद्दी पर विराजमान किया और
26अपने सिक्खो पुत्रो और रिश्तेदारों को श्री गुरु रामदास जी के चरणो में लगवाया ॥ ४ ॥
27ज्योति-ज्योत समाने के समय अन्त में सतिगुरु अमरदास जी ने कहा कि मेरे बाद शब्द कीर्तन करना।
28ईश्वर के पण्डित अर्थात् संतजनों को बुलवा लेना और हरि का कीर्तन कथा ही पुराणों का पठन होगा।
29हरि की कथा पढ़ना एवं हरि नाम सुनना, गुरु को हरि का रंग रूपी विमान ही अच्छा लगता है।
30मेरी अस्थियां हरि सर में डाल देना पिण्ड भरवाना, पतल ,क्रिया एवं दीया जगाना इत्यादि सत्संग में प्रभु का गुणगान करने में होगा।
31जैसे परमात्मा को भाया है, वही सतिगुरु ने कहा है, मुझे परमपुरुष परमेश्वर मिल गया है और उसी में विलीन हो रहा हूँ।
32सतिगुरु अमरदास जी ने सोढी रामदास को गुरुयाई का तिलक बाबा बुड़ा जी से लगवाया और सत्य-नाम एवं शब्द प्रदान किया जो सबके लिए सर्वमान्य है॥ ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं