गुरु ग्रंथ साहिब 922 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji
1नानक कहते हैं कि सब करने-करवाने में समर्थ प्रभु स्वयं ही आ मिला है॥ ३४॥
2हे मेरे शरीर ! इस जगत् में आकर तूने कौन-सा शुभ कर्म केिया है ?
3हे शरीर ! इस जगत् में आकर तूने क्या कर्म किया है ?
4जिस परमात्मा ने तेरी रचना की है, उसे तो मन में ही नहीं बसाया।
5गुरु की कृपा से ईश्वर उसके मन में ही बसा है, पूर्व कर्मो के कारण जिसे यह फल प्राप्त हुआ है।
6नानक कहते हैं कि जिसने सतगुरु में चित्त लगाया है, उसका यह शरीर सफल हो गया है ॥ ३५ ॥
7हे मेरे नेत्रो ! परमात्मा ने तुझ में ज्योति स्थापित की है, इसलिए उसके अतिरिक्त किसी अन्य को मत देखो।
8प्रभु के अलावा किसी अन्य को मत देखो, क्योंकि उसकी कृपा से ही तुझे दृष्टि मिली है।
9यह जो विश्व-संसार तुम देख रहे हो, यह परमात्मा का रूप है और परमात्मा का ही रूप नजर आ रहा है।
10गुरु की कृपा से यह रहस्य समझ में आ गया है, जिधर भी देखता हूँ, एक ईश्वर ही दिखाई देता है और उसके अलावा अन्य कोई नहीं है।
11नानक कहते हैं कि यह नेत्र पहले अन्धे थे परन्तु सतगुरु को मिलकर दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो गई है॥ ३६॥
12हे मेरे कानो ! परमात्मा ने तुम्हें जगत् में सत्य सुनने के लिए भेजा है।
13सत्य सुनने के लिए प्रभु ने शरीर के साथ लगाकर दुनिया में भेजा है इसलिए सत्य की वाणी सुनो,
14जिसे सुनने से मन-तन प्रफुल्लित हो जाता है और रसना हरि-रस में विलीन हो जाती है।
15उस परम सत्य, अलक्ष्य एवं अद्भुत प्रभु की विचित्र गति अकथनीय है।
16नानक कहते हैं कि नामामृत को सुनो एवं पवित्र हो जाओ, परमेश्वर ने तुम्हें सत्य सुनने के लिए जगत् में भेजा है॥ ३७॥
17परमेश्वर ने आत्मा को शरीर रूपी गुफा में रखकर प्राणों का बाजा बजाया है।
18उसने प्राणों का वाजा बजाया अर्थात् जीवन साँसों का संचार किया, शरीर रूपी गुफा के नौ द्वार-ऑखें, कान, मुंह, नाक इत्यादि प्रगट किए और दसम द्वार को गुप्त रखा हुआ है।
19उसने गुरु में श्रद्धा लगाकर दसम द्वार दिखा दिया है।
20वहाँ दसम द्वार में अनेक रूप एवं नौ निधियों वाले नाम का निवास है, जिसका रहस्य नहीं पाया जा सकता।
21नानक कहते हैं कि प्यारे प्रभु ने आत्मा को शरीर रूपी गुफा में स्थित कर प्राणों का संचार किया है॥ ३८ ॥
22परमात्मा का यह सच्चा कीर्तन सच्चे घर (सत्संगति) में बैठकर गान करो।
23उस सच्चे घर (सत्संगति) में बैठकर सच्चा कीर्तिगान करो, जहाँ सदैव सत्य का ध्यान किया जाता है।
24हे ईश्वर ! जो तुझे भाते हैं और जिन गुरुमुखों को ज्ञान हो जाता है, वही परम-सत्य का ध्यान करते हैं।
25यह परम सत्य सबका मालिक है, सत्य उसे ही प्राप्त होता है, जिसे वह स्वयं प्रदान करता है।
26नानक कहते हैं कि सच्चे घर (सत्संगति) में बैठकर परम-सत्य का कीर्तिगान करते रहो ॥ ३६ ॥
27हे भाग्यशालियो ! आप श्रद्धा से ‘अनंद वाणी को सुनो, इसे सुनने से सब मनोरथ पूरे हो जाते हैं।
28जिसने परब्रह्म प्रभु को पा लिया है, उसके सभी दुख-दर्द दूर हो गए हैं।
29जिसने सच्ची वाणी सुनी है, उसके सब दुख रोग एवं संताप उतर गए हैं।
30जिन्होंने पूर्ण गुरु से इस वाणी को जान लिया है, वे सभी सज्जन संत प्रसन्न हो गए हैं।
31इस वाणी को सुनने वाले पावन हो जाते हैं और इसे जपने वाले भी पवित्र हो जाते हैं। सतगुरु अपनी वाणी में व्यापक है।
32नानक विनती करते हैं कि गुरु के चरणों में लगने से मन में अनहद ध्वनियों वाले बाजे बज रहे हैं।॥ ४०॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं