गुरु ग्रंथ साहिब 921 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji
1सच तो यह है कि वह स्वयं ही अपनी लगन में लगाता है और गुरुमुख बनकर सदा ही उसे स्मरण करना चाहिए।
2नानक कहते हैं जो इतना बड़ा दाता है, उसे मन से क्यों भुलाएँ ? ॥ २८ ॥
3जैसी अग्नि माता के गर्भ में है, वैसी ही वाहर माया है।
4माया एवं गर्भ की अग्नि दोनों एक समान ही (दुखदायक) हैं, ईश्वर ने यह एक लीला रची हुई है।
5जब ईश्वरेच्छा हुई तो ही शिशु का जन्म हुआ, जिससे पूरे परिवार में खुशी का वातावरण बन गया।
6जब शिशु का जन्म हुआ तो उसकी परमेश्वर से लगन छूट गई, तृष्णा लग गई और माया ने अपना हुक्म लागू कर दिया।
7यह माया ऐसी है, जिससे जीव परमात्मा को भूल जाता है, फिर उसके मन में मोह उत्पन्न हो जाता है और द्वैतभाव लग जाता है।
8नानक कहते हैं कि गुरु की कृपा से जिनकी ईश्वर में लगन लग गई है, उन्होंने माया में भी उसे प्राप्त कर लिया है॥ २६ ॥
9ईश्वर स्वयं अमूल्य है और उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
10किसी से भी उसका सही मूल्य ऑका नहीं जा सकता, कितने ही लोग उसके लिए रोते तरसते हार गए हैं।
11यदि सतगुरु मिल जाए, तो उसे अपना सिर अर्पण कर देना चाहिए, इससे मन का अहम् दूर हो जाता है।
12जिसके यह दिए हुए प्राण हैं, यदि जीव उससे मिला रहे तो परमात्मा मन में स्थित हो जाता है।
13हे नानक ! परमात्मा स्वयं अमूल्य है और वही भाग्यवान् है, जो उसे प्राप्त करता है॥ ३० ॥
14हरि-नाम मेरा राशन है और मेरा मन व्यापारी हैं।
15मेरा मन व्यापारी और हरि-नाम मेरी जीवन-राशन है, इस राशन का ज्ञान मुझे सतगुरु से मिला है।
16दिल से नित्य हरि-नाम को जपते रहो और प्रतिदिन नाम-रूपी लाभ प्राप्त करो।
17यह नाम-धन उन्हें ही मिला है, जिन्हें परमात्मा ने स्वयं अपनी इच्छा से दिया है।
18नानक कहते हैं किं हरि-नाम मेरी जीवन-राशि है और मन व्यापारी बन गया है॥ ३१ ॥
19हे रसना ! तू अन्य रसों में लीन रहती है, पर तेरी प्यास नहीं बुझती।
20किसी अन्य प्रकार से तेरी प्यास नहीं बुझ सकती, जब तक तू हरि-रस को प्राप्त करके उसका पान नहीं करती।
21हरि-रस को पा कर उसका पान कर ले, चूंकि हरि-रस का पान करने से दोबारा कोई तृष्णा नहीं लगेगी।
22यह हरि-रस शुभ कर्मों से ही प्राप्त होता है, जिसे सतगुरु मिल जाता है।
23नानक कहते हैं कि जब परमात्मा मन में बस जाता है तो अन्य सभी रस भूल जाते हैं।॥ ३२ ॥
24हे मेरे शरीर ! जब परमेश्वर ने तुझ में ज्योति स्थापित की तो तू तब ही इस जगत् में आया।
25ईश्वर ने जब ज्योति स्थापित की तो ही तू जगत् में आया है।
26वह स्वयं ही सबका माता-पिता है, जिसने प्रत्येक जीव को पैदा करके यह जगत् दिखाया है।
27गुरु की कृपा से समझा तो यह कौतुक हुआ कि यह जगत् कौतुक रूप ही नजर आया है।
28नानक कहते हैं कि जब परमात्मा ने सृष्टि का मूल रचा तो उसने तुझ में अपनी ज्योति स्थापित की और तब ही तू इस जगत् में आया है॥ ३३॥
29प्रभु के आगमन की खुशखबरी सुनकर मन में बड़ा चाव (उमंग) उत्पन्न हो गया है।
30हे मेरी सखी ! परमात्मा का मंगलगान करो, यह हृदय-घर पावन मन्दिर बन गया है।
31हे सखी ! नित्य प्रभु का मंगलगान करने से कोई दुख-दर्द एवं चिंता नहीं लगती।
32वह दिन भाग्यशाली है, जब गुरु-चरणों में मन लग जाता है और प्रिय-प्रभु की अनुभूति होती है।
33गुरु के शब्द से अनहद वाणी की जानकारी मिली है, हरि-नाम जपो एवं हरि-रस का पान करते रहो।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं