सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 920 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji

1नानक कहते हैं कि हे संतो ! ध्यानपूर्वक सुनो; वही शिष्य गुरु के सन्मुख होता है॥ २१॥

2यदि कोई शिष्य गुरु से विमुख हो जाए तो सतगुरु के बिना उसे मुक्ति नहीं मिलती।

3उसे किसी अन्य स्थान पर मुक्ति नहीं मिलती, चाहे इस संदर्भ में कोई जाकर विवेकवान महापुरुषों से पूछ लो।

4चाहे वह अनेक योनियों में भटक कर पुनः मानव योनि में आ जाए, तो भी गुरु के बिना मुक्ति नहीं पा सकता।

5वह दोबारा गुरु-चरणों में लगकर तभी मुक्ति पाता है, जब सतगुरु उसे शब्द (उपदेश) सुनाता है।

6नानक कहते हैं कि विचार करके देख लो, विमुख जीव सतगुरु के बिना मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता ॥ २२॥

7हे गुरु के प्यारे शिष्यो ! आओ, सच्ची वाणी गाओ।

8वाणी केवल गुरु की ही गान करो, जो सब वाणियों में सर्वोत्तम वाणी है।

9जिन पर परमात्मा की कृपा-दृष्टि हो जाती है, यह वाणी उनके हृदय में समा जाती है।

10नामामृत का पान करो; सदा परमात्मा के रंग में लीन रहो और सदैव प्रभु का नाम जपते रहो।

11नानक कहते हैं केि सदेव यह सच्ची वाणी गाते रहो॥ २३॥

12सतगुरु के बिना अन्य वाणी कच्ची है, गुरु के मुखारविंद से उच्चरित वाणी ही सत्य है।

13गुरु के अलावा अन्य सब वाणी झूठी है।

14कच्ची वाणी को मुंह से जपने एवं सुनने वाले भी कच्चे अर्थात् झूठे हैं और झूठे मनुष्यों ने कहकर कच्ची वाणी ही उच्चारण की है।

15ऐसे व्यक्ति अपनी रसना से नित्य हरि नाम बोलते रहते हैं लेकिन उस बारे कुछ भी ज्ञान नहीं जानते।

16जिनका चित माया ने चुरा लिया है, वे व्यर्थ ही बोल रहे हैं।

17नानक कहते हैं कि सतगुरु के मुखारविंद से उच्चरित वाणी ही सत्य है, अन्य सब वाणी कच्ची अर्थात् मिथ्या है॥ २४॥

18गुरु का शब्द अमूल्य रत्न है, जिसमें गुण रूपी बहुमूल्य हीरे जड़ित हैं।

19शब्द रूपी अमूल्य रत्न में जिसका मन लग गया है, वह उसी में लीन हो गया है।

20जिसका मन शब्द से मिल गया है, उसने सत्य से प्रेम लगा लिया है।

21परमात्मा स्वयं ही शब्द रूपी रत्न एवं स्वयं ही गुरु रूपी हीरा है, वह जिसे यह शब्द रूपी रत्न देता है, वही इस तथ्य को समझता है।

22नानक कहते हैं कि गुरु-शब्द एक बहुमूल्य रत्न है, जिसमें गुण रूपी कीमती हीरे जड़ित हैं।॥ २५ ॥

23शिव शक्ति (चेतन एवं माया) को उत्पन्न करके ईश्वर स्वयं ही अपना हुक्म चला रहा है।

24वह हुक्म चलाकर स्वयं ही अपनी लीला को देखता रहता है, परन्तु किसी गुरुमुख को ही इस रहस्य की सूझ देता है

25जिसके मन में शब्द का निवास हो जाता है, वह सब बन्धनों को तोड़कर मुक्त हो जाता है।

26परमात्मा जिसे स्वयं बनाता है, वही गुरुमुख बनता है और वह एक परमेश्वर में ध्यान लगा लेता है।

27नानक कहते हैं कि स्रष्टा स्वयं ही अपने हुक्म की सूझ प्रदान करता है॥ २६॥

28स्मृतियों एवं शास्त्र पाप-पुण्य का विचार करते हैं परन्तु वे भी सार तत्व को नहीं जानते।

29गुरु के बिना सार तत्व को नहीं जाना जाता, तत्व ज्ञान नहीं मिलता।

30त्रिगुणात्मक संसार अज्ञान की निद्रा में सोया हुआ है और अज्ञान की निद्रा में ही जीवन रूपी रात्रेि व्यतीत हो जाती है।

31गुरु की कृपा से वही जीव अज्ञान की निद्रा से जागे हैं, जिनके मन में परमात्मा आ बसा है और वे अमृत-वाणी जपते रहते हैं।

32नानक कहते हैं कि उसे ही तत्व ज्ञान प्राप्त होता है, जिसकी दिन रात परमात्मा में लगन लगी रहती है और उसकी जीवन-रात्रि जाग्रत रहते ही बीत जाती है। २७ ॥

33जो माता के उदर में भी पालन-पोषण करता है, उसे मन से क्यों भुलाएँ ?

34वह इतना बड़ा दाता है, उसे मन से कैसे भुलाया जा सकता है, जो गर्भाग्नि में हमें भोजन पहुँचाता है।

35वह जिसे अपनी लगन में लगा लेता है, उसे कोई दुख-दर्द स्पर्श नहीं कर सकता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं