सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 91 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1भगवान भक्तों को आनंद प्रदान करता है और उन्हें अपने अटल घर में स्थिर करके विराजमान करता है।

2वह पापियों को स्थिर नहीं रहने देता और उन्हें चुन-चुनकर घोर नरकों में डालता है।

3भगवान अपने भक्तों से बहुत प्रेम करता है और उनका पक्ष लेते हुए उन्हें भवसागर से पार कर देता है ॥ १६ ॥

4श्लोक महला १॥

5गुरु साहिब जी फुरमाते हैं कि हे पण्डित ! तेरे शरीर रूपी घर में कुबुद्धि का निवास है, जो डोमनी है, हिंसा का भी निवास है, जो कसाइन है, जो पराई निंदा रहती है, वह भंगिन है और क्रोध चाण्डाल के रूप में रहता है।

6यह सभी वृतियाँ तेरे शुभ गुणों को लूट रही हैं लकीरें खींचने का तुझे क्या लाभ है, जब ये चारों ही तेरे साथ विराजमान हैं ?

7सत्य को अपना संयम, शुभ आचरण को अपनी लकीरें एवं नाम स्मरण को अपना स्नान बना।

8हे नानक ! परलोक में केवल वही सर्वश्रेष्ठ होंगे, जो गुनाहों के मार्ग पर नहीं चलते॥ १॥

9महला १॥

10हे नानक ! यदि प्रभु चाहे तो वह विष्टा खाने वाले कौए को भी मोती चुगने वाला हंस बना देता है।

11जिस पर प्रभु अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वह बगुले जैसे पाखंडी पापी को भी हंस जैसा पवित्र बना देता है ॥ २॥

12पउड़ी ॥

13यदि कोई कार्य करने की आवश्यकता पड़ जाए तो उसकी सफलता के लिए भगवान के पास प्रार्थना करनी चाहिए।

14सतिगुरु की शिक्षा द्वारा सत्य प्रभु अपने सेवक का कार्य संवार देता है।

15संतों की संगति में मिलकर ही नाम रूपी अमृत भण्डार को चखा जाता है।

16हे भय को नाश करने वाले मेहरबान प्रभु ! अपने सेवकों की लाज-प्रतिष्ठा रखो।

17हे नानक ! भगवान की महिमा-स्तुति करने से अलक्ष्य प्रभु से साक्षात्कार हो जाता है॥ २०॥

18श्लोक महला ३॥

19यह शरीर एवं प्राण सब कुछ भगवान की देन है, वह सभी जीवों को सहारा देता है।

20हे नानक ! गुरु के माध्यम से हमेशा ही उस दाता-प्रभु का सिमरन करना चाहिए।

21मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ जो निरंकार प्रभु की आराधना करते हैं।

22उनके मुख सदैव उज्ज्वल रहते हैं और सारा संसार उनको प्रणाम करता है ॥ १॥

23महला ३॥

24यदि सतिगुरु मिल जाए तो मनुष्य की वृति माया से हट जाती है, उसे नवनिधियों की उपलव्धि हो जाती है, जिन्हें वह खाता एवं खर्च करता है।

25समस्त अठारह सिद्धियाँ उसके आगे-पीछे लगी रहती हैं, वह अपने आत्म-स्वरूप निज घर में जाकर रहता है।

26उसके मन में हमेशा ही अनहद ध्वनि बजती रहती है, वह परमानंद अवस्था में रहता हुआ भगवान में सुरति लगाकर रखताहै।

27हे नानक ! जिनके माथे पर प्रारम्भ से ही उनकी किस्मत में लिखा होता है, उनके मन में ही भगवानकी भक्ति निवास करती है ॥ २ ॥

28पउड़ी ॥

29मैं अपने मालिक हरि-प्रभु का चारण हूँ और प्रभु के द्वार पर आया हूँ।

30ईश्वर ने भीतर से मेरी ऊँची पुकार सुनकर मुझ चारण को अपनी उपस्थिति में बुलवा लिया।

31भगवान ने मुझे बुलाकर पूछा कि तुम किस मनोरथ हेतु मेरे पास आए हो।

32हे मेरे दयावान परमात्मा ! मुझे हमेशा ही अपने हरि नाम-सिमरन का दान दीजिए।

33नानक की यह विनती सुनकर दाता-प्रभु ने उसे हरि-नाम स्मरण करवाया तथा उसे सम्मान की पोशाक पहनाई॥ २१॥ १॥ सुधु॥

34ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

35श्रीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा

36माता सोचती है कि उसका पुत्र बड़ा होता जा रहा है परन्तु वह इतना नहीं समझती कि प्रतिदिन उसकी आयु के दिन कम होते जा रहे हैं।

37माता बड़े लाड-प्यार से उसको 'मेरा-मेरा' कह कर स्नेह करती है, परन्तु यमराज यह मोह देखकर मुस्कराता है॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं