सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 919 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji

1गुरु की कृपा से जिन्होंने अहम् को त्याग दिया है, उनकी वासना परमात्मा में समा गई है।

2नानक कहते हैं कि भक्तों का जीवन-आचरण युगों-युगान्तरों से ही दुनिया के लोगों से निराला है॥ १४॥

3हे स्वामी ! जैसे तू चलाता है, हम वैसे ही चलते हैं। मैं तेरे गुणों को नहीं जानता।

4जैसे तू चलाता है, वैसे ही चलते हैं, जिस मार्ग पर तू डालता है।

5अपनी कृपा करके जिन्हें तू नाम-स्मरण में लगा देता है, वे सदा ही तेरा ध्यान करते रहते हैं।

6जिसे तू अपनी कथा सुनाता है, वे गुरु के द्वार पर सुख प्राप्त करते हैं।

7नानक कहते हैं केि हे सच्चे मालिक ! जैसे तुझे मंजूर होता है, वैसे ही जीवों को चलाता है॥ १५ ॥

8यह सुन्दर शब्द ही ईश्वर का कीर्तिगान है।

9सतगुरु ने सदा सुन्दर शब्द का कीर्तिगान सुनाया है।

10यह उनके ही मन में आकर बसा है, जिनके भाग्य में आदि से ही लिखा हुआ आया है।

11कुछ व्यक्ति भटकते रहते हैं और बहुत बातें करते हैं, किन्तु बातों से किसी ने भी प्राप्त नहीं किया।

12नानक कहते हैं कि सतगुरु ने शब्द का ही कीर्तिगान सुनाया है॥ १६ ॥

13जिन्होंने परमात्मा का ध्यान किया है, वे पवित्र हो गए हैं।

14परमात्मा का ध्यान करके वही पवित्र हुए हैं, जिन्होंने गुरुमुख बनकर ध्यान-मनन किया है।

15वे अपने माता-पिता एवं परिवार सहित पवित्र हो गए हैं और उनकी संगति करने वाले भी पवित्र हो गए हैं।

16हरि-नाम को मुँह से जपने वाले एवं कानों से सुनने वाले पवित्र हो गए हैं और जिन्होंने मन में बसाया है, वे भी पवित्र पावन हो गए हैं।

17नानक कहते हैं कि जिन्होंने गुरुमुख बनकर ईश्वर का ध्यान किया है, वे पवित्र हो गए हैं॥ १७॥

18धर्म-कर्म करने से मन में सहज ज्ञान उत्पन्न नहीं होता और सहज ज्ञान के बिना मन की चिंता दूर नहीं होती।

19यह चिंता किसी भी साधन से मन से दूर नहीं होती और अनेक लोग कर्मकाण्ड कर-करके थक गए हैं।

20यह अन्तर्मन संशय चिंता से मलिन हो गया है, इसे किस साधन द्वारा शुद्ध किया जाए।

21मन को शुद्ध करने के लिए शब्द से लगन लगाओ और परमात्मा के साथ चित लगाओ।

22नानक कहते हैं कि गुरु की कृपा से सहज-ज्ञान पैदा हो जाता है और इस प्रकार संशय-चिंता मन से दूर हो जाती है।॥ १८ ॥

23कोई मन से मैला है, परन्तु बाहर से निर्मल होने का दिखावा करता है।

24जो बाहर से निर्मल होने का दिखावा करता है और मन से मैला होता है, उसने अपना जन्म जुए में हार दिया है।

25उसे तृष्णा का यह बहुत बड़ा रोग लगा हुआ है और उसने मृत्यु को अपने मन से भुला दिया है।

26वेदों में नाम को सर्वोत्तम बताया गया है परन्तु यह लोग उसे सुनते ही नहीं और प्रेतों की तरह भटकते रहते हैं।

27नानक कहते हैं कि जिन्होंने सत्य को त्याग कर झूठ से मोह लगा लिया है, उन्होंने अपना अमूल्य जन्म जुए में हार दिया है॥ १६॥

28कुछ व्यक्ति दिल से भी निर्मल होते हैं और बाहर से भी निर्मल होते हैं।

29ऐसे दिल से एवं बाहर से निर्मल व्यक्ति सतगुरु के उपदेशानुसार शुभ करनी की कमाई करते हैं।

30उन्हें झूठ स्पर्श भी नहीं करता और उनका मन सत्य में ही विलीन रहता है।

31वही व्यापारी उत्तम हैं, जिन्होंने रत्न जैसा अमूल्य जन्म का लाभ हासिल कर लिया है।

32नानक कहते हैं कि जिनका मन निर्मल है, वे सदा ही गुरु के साथ रहते हैं।॥ २०॥

33यदि कोई शिष्य गुरु के सन्मुख हो जाए।

34यदि कोई शिष्य गुरु के सन्मुख हो जाए तो वह दिल से भी गुरु के साथ बना रहता है।

35वह हृदय में गुरु के चरणों का ध्यान करता रहता है और अन्तरात्मा में भी उसकी स्मृति में ही लीन रहता है।

36वह अपने अहम् को छोड़कर गुरु के सहारे रहता है और गुरु के बिना अन्य किसी को नहीं जानता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं