सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 918 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji

1हे बाबा ! जिसे तू देता है, वही व्यक्ति प्राप्त करता है।

2वही व्यक्ति प्राप्त करता है, जिसे तू स्वयं देता है, कोई अन्य बेचारा भला क्या कर सकता है।

3कोई भ्रम में भूला हुआ है और दसों दिशाओं में भटक रहा है लेकिन किसी ने नाम के संग लगकर अपना जीवन सफल कर लिया है।

4जिन्हें परमात्मा की रज़ा अच्छी लगी है, गुरु की कृपा से उनका मन निर्मल हो गया है।

5नानक कहते हैं कि जिसे प्यारा प्रभु देता है, वही व्यक्ति प्राप्त करता है॥ ८॥

6हे प्यारे संतजनो ! आओ, हम मिलकर अकथनीय प्रभु की कथा कहानी करें।

7हम अकथनीय परमात्मा की कथा करें और सोचे कि उसे किस विधि द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

8अपना तन, मन, धन सब कुछ गुरु को सौंपकर उसके हुक्म का पालन करके ही ईश्वर को पाया जा सकता है।

9गुरु के हुक्म का पालन करो और उसकी सच्ची वाणी गाओ।

10नानक कहते हैं कि हे संतजनो ! सुनो, परमेश्वर की अकथनीय कथा कथन करें ॥ ६॥

11हे चंचल मन ! चतुराई से किसी ने भी ईश्वर को प्राप्त नहीं किया।

12हे मेरे मन ! तू ध्यान से मेरी बात सुन, चतुराई से किसी ने भी ईश्वर को नहीं पाया।

13यह माया ऐसी मोहिनी है, जिसने जीवों को भ्रम में डालकर सत्य से भुलाया हुआ है।

14यह मोहिनी माया भी उस परमात्मा की ही पैदा की हुई है, जिसने मोह रूपी ठग-बूटी जीवों के मुंह में डाली हुई है।

15मैं उस परमात्मा पर कुर्बान जाता हूँ, जिसने (नाम का) मीठा मोह लगाया हुआ है।

16नानक कहते हैं कि हे चंचल मन ! चतुराई से किसी ने भी परमात्मा को प्राप्त नहीं किया ॥ १० ॥

17हे प्यारे मन ! तू सदा सत्य का ध्यान कर।

18यह परिवार जिसे तू देखता है, इसने तेरे साथ नहीं जाना।

19जिस परिवार ने तेरे साथ नहीं जाना, उसके साथ तू क्यों चित्त लगा रहा है।

20ऐसा काम बिल्कुल नहीं करना चाहिए, जिससे अन्त में पछताना पड़े।

21तू सतगुरु का उपदेश सुन, यही तेरे साथ रहेगा।

22नानक कहते हैं कि हे प्यारे मन ! तू सदा सत्य का ध्यान किया कर ॥ ११ ॥

23हे अगम्य, अगोचर परमेश्वर ! तेरा अन्त किसी ने भी प्राप्त नहीं किया।

24किसी ने भी तेरा अन्त नहीं पाया, तू स्वयं ही अपने आप को जानता है।

25यह सभी जीव-जन्तु तेरा खेल (लीला) है, इस संदर्भ में कोई क्या कहकर बयान करे।

26जिसने यह जगत् पैदा किया है, तू ही सब में बोल रहा एवं देख रहा है।

27नानक कहते हैं कि हे ईश्वर ! तू सदा अगम्य है, तेरा अन्त किसी ने भी नहीं पाया ॥ १२ ॥

28जिस अमृत को देवता, मनुष्य एवं मुनिजन भी खोजते हैं, वह अमृत मुझे गुरु से प्राप्त हुआ है।

29गुरु की कृपा से मुझे अमृत प्राप्त हुआ है और परम-सत्य को मेरे मन में बसा दिया है।

30हे ईश्वर ! सभी जीव-जन्तु तूने ही उत्पन्न किए हैं, पर कोई विरला ही गुरु के दर्शन एवं चरण-स्पर्श करने आया है।

31उसका लालच, लोभ एवं अहंकार दूर हो गया है और उसे सतगुरु ही भला लगा है।

32नानक कहते हैं कि जिस पर परमात्मा स्वयं प्रसन्न हो गया है, उसे गुरु से अमृत मिल गया है॥ १३॥

33भक्तों का जीवन-आचरण दुनिया के अन्य लोगों से निराला होता है।

34भक्तों का जीवन-आचरण इसलिए निराला है, क्योंकि उन्होंने बड़े कठिन मार्ग पर चलना होता हैं।

35वे लालच, लोभ, अहंकार एवं तृष्णा को त्याग कर अधिक नहीं बोलना चाहते।

36उन्होंने इस मार्ग पर जाना होता है, जो तलवार की धार से भी तीक्ष्ण एवं बाल से भी छोटा होता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं