सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 916 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1परमात्मा अपने जीवों की स्वयं ही देखभाल करता है और स्वयं ही अपने संग लगा लेता है॥ १५॥

2गुरु ने सत्य धर्म का बेड़ा बाँधकर अपनी संगत को भवसागर से पार करवा दिया है॥ १६॥

3जगत् का स्वामी बेशुमार एवं बेअंत है और नानक उस पर बार-बार बलिहारी जाता है॥ १७॥

4अकालमूर्ति, अयोनि एवं स्वयंभू ईश्वर ने कलियुग के अज्ञान रूपी अन्धेरे में ज्ञान रूपी दीपक प्रज्वलित कर दिया है।१८ ।

5वह अन्तर्यामी सब जीवों का दाता है, जिसके दर्शन करने से पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है॥ १६॥

6वह ऑकार, मायातीत, निर्भय प्रभु जल एवं पृथ्वी में समा रहा है॥ २०॥

7हे नानक ! भक्ति का दान ईश्वर ने भक्तों को ही दिया है और वह भी उससे यही याचना करता है॥ २१॥ १॥ ६ ॥

8रामकली महला ५ ॥

9श्लोक ॥

10हे प्यारे शिष्यो ! शब्द का चिंतन करो; यही जन्म एवं मरण का आसरा है।

11हे नानक ! प्रभु का सिमरन करने से मुख उज्ज्वल हो जाता है और जीव सदा सुखी रहता है॥१॥

12हे संतजनो ! यह तन-मन राम के प्रेम में ही लीन रहता है और उसकी प्रेम-भक्ति ही अच्छी लगती है।॥ १॥

13सतगुरु ने नाम रूपी सौदे का व्यापार करने के लिए अपनी प्रीति निभा दी है।

14हे संतजनो ! उसने हरि-नाम रूपी लाभ अपने दास को दिया है और मन की सारी तृष्णा मिटा दी है॥ १॥ रहाउ॥

15खोजते-खोजते एक बहुमूल्य रत्न प्राप्त हुआ है। हे संतजनो ! उस हरि-नाम रूपी रत्न की सही कीमत आंकी नहीं जा सकती॥ २॥

16हे संत पुरुषो ! परमात्मा के चरण-कमल से ध्यान लग गया है और उस सच्चे के दर्शनों में ही विलीन हो गया हूँ॥ ३ ॥

17भगवान का गुणगान कर करके निहाल हो गया हूँ। हे सज्जनो, उसका सिमरन करने से मन तृप्त एवं संतुष्ट हो गया है॥ ४॥

18हे संत पुरुषो ! सब में ईश्वर ही व्याप्त है, इधर-उधर जाने की आवश्यकता नहीं है॥ ५ ॥

19सब को सुख देने वाला परमात्मा युगों-युगान्तरों से मौजूद है, वह वर्तमान में भी है और भविष्य में भी उसका ही अस्तित्व रहेगा।॥ ६॥

20वह बेअंत है, उसका अन्त नहीं पाया जा सकता और वह हर स्थान पर पूर्णतया व्याप्त है॥ ७ ॥

21नानक कहते हैं कि हे संतजनो ! परमेश्वर ही मेरा मित्र, साजन, धन-दौलत, यौवन एवं पुत्र है और वही मेरा माता-पिता है॥ ८ ॥ २॥ ७ ॥

22रामकली महला ५ ॥

23मैं मन, वचन एवं कर्म से राम नाम ही याद करता रहता हूँ।

24हे नानक ! यह जगत् भेंवर की तरह बड़ा कठिन है, लेकिन गुरु ने मेरी जीवन-नैया पार उतार दी है॥ १॥ रहाउ॥

25मेरे अन्दर-बाहर सुख ही सुख हो गया है, ईश्वर का जाप करने से कामादिक दुष्टों का नाश हो गया है॥ १॥

26जिसके हुक्म से ये दुष्ट विकार लगे थे, उसने ही उनको दूर कर दिया है। प्रभु जी ने स्वयं ही अपनी कृपा की है॥ २॥

27जो संतजन भगवान की शरण में आ गए हैं, उनका उद्धार हो गया है, किन्तु महा अहंकारी जीवों का विकारों में ही नाश हो गया है॥ ३॥

28साधुओं की संगति में यही फल प्राप्त हुआ है कि केवल एक प्रभु का नाम ही मेरा जीवनाधार बन गया है॥ ४॥

29हे परमात्मा ! न कोई शूरवीर है और न कोई कमजोर है, क्योंकि सब में तेरी ही ज्योति प्रगट हो रही है॥ ५॥

30हे ईश्वर, तू सर्वकला समर्थ, अकथनीय एवं मन-वाणी से परे है और सबमें तू ही व्यापक है॥ ६ ॥

31हे कर्ता-प्रभु ! तेरी कीमत कौन ऑक सकता है ? तू अनन्त एवं अपरम्पार है॥ ७ ॥

32नानक प्रार्थना करते हैं केि हे ईश्वर ! तेरा नाम-दान ही बड़ा यश है और तेरे सन्तजनों की चरण-धूलि ही चाहता हूँ॥ ८॥ ३॥ ८ ॥ २२ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं