सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 915 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1तेरी कृपा से ही तुझसे मेरी प्रीति लगी है।

2जब तू दयालु हुआ तो ही तू याद आया है।

3दयालु प्रभु ने जब कृपा की तो

4मेरा बन्धनों से छुटकारा हो गया ॥ ७ ॥

5मैंने ऑखें खोलकर सब स्थान देख लिए हैं,

6उस परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई नजर नहीं आता।

7गुरु की कृपा से सब भ्र्म एवं भय दूर हो गए हैं।

8हे नानक ! उस प्रभु की अद्भुत लीला ही सब जगह दिखाई दे रही है॥ ८ ॥ ४॥

9रामकली महला ५ ॥

10हे प्रभु! ये सभी जीव-जन्तु जो दिखाई दे रहे हैं, सबको तूने ही धारण किया हुआ है॥ १॥

11इस मन का उद्धार हरि के नाम से ही होता है॥ १॥ रहाउ॥

12समूची कुदरत ईश्वर की रचना है, वह क्षण में ही बनाने एवं मिटाने वाला है॥ २॥

13साधुओं की संगति द्वारा काम, क्रोध, लोभ, झूठ एवं निंदा को नष्ट किया जा सकता है॥ ३॥

14प्रभु का नाम जपने से मन निर्मल हो जाता है और सारा जीवन सुख में ही गुजरता है॥ ४॥

15जो प्राणी भक्त की शरण में आ जाता है, वह लोक-परलोक में अपनी जीवन बाजी नहीं हारता॥ ५॥

16हे परमेश्वर ! इस मन की सुख-दुख की व्यथा तेरे समक्ष है, कल्याण करना॥ ६॥

17तू सब जीवों का दाता है और स्वयं ही पालन-पोषण करता है॥ ७ ॥

18नानक तेरे भक्तजनों पर करोड़ों बार न्यौछावर जाता है॥ ८ ॥ ५ ॥

19रामकली महला ५ असटपदी

20ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

21गुरु के दर्शन एवं साक्षात्कार से सभी पाप दूर हो जाते हैं और वह ईश्वर से मिला देता है॥ १ ॥

22मेरा गुरु-परमेश्वर सुख देने वाला है,

23वह परब्रह्म का नाम स्मरण करवाता है और अंत में सहायक बनता है॥ १॥ रहाउ॥

24जिसने संत-गुरु की चरण-धूलि अपने मुख पर लगाई है, उसके सब दुखों का पहाड़ नष्ट हो गया है॥ २।

25उसने क्षण में ही पतितों को पावन कर दिया है और उनका अज्ञान का अंधेरा मिटा दिया है।॥ ३॥

26हे नानक ! मेरा स्वामी करने-करवाने में समर्थ है, इसलिए उसकी शरण ली है॥ ४॥

27उसने सब बन्धन तोड़कर प्रभु के चरण-कमल मन में बसा दिए हैं और एक शब्द में लगन लगा दी है॥ ५॥

28गुरु ने माया के विष रूपी अंधकूप से निकाल दिया है और अब सच्चे शब्द से प्रीति पैदा हो गई है। ६॥

29मेरा जन्म-मरण का संशय दूर हो गया है और अब इधर-उधर नहीं भटकता॥ ७॥

30यह मन नाम-रस में ही लीन रहता है और नामामृत का पान करके तृप्त हो चुका है॥ ८॥

31संतों के संग मिलकर परमात्मा का कीर्तिगान किया है और निश्चल स्थान में वास हो गया है॥ ६ ॥

32पूर्ण गुरु ने पूर्ण उपदेश दिया है कि भगवान के बिना अन्य कोई आधार नहीं ॥ १० ॥

33हे नानक ! जिस भाग्यशाली ने नाम रूपी भण्डार प्राप्त किया है, वह नरक में नहीं जाता॥ ११॥

34मेरे पास कोई साधना, बुद्धिमानी एवं चतुराई नहीं है, केवल पूर्ण गुरु की दी हुई नाम की कमाई है॥ १२॥

35जो प्रभु करता एवं करवाता है, मेरे लिए वही जप, तप, संयम एवं शुभ कर्म है॥ १३॥

36पुत्र, पत्नी इत्यादि महाविकारों में भी सच्चे गुरु ने संसार-सागर से पार करवा दिया है॥ १४॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं