सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 913 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1किसी ने कहा है कि अपने भाईयों की मदद के कारण मेरा बड़ा बाहुबल है,

2कोई कह रहा है कि अधिक धन दौलत के कारण मैं ही धनवान हूँ,

3परन्तु मुझ दीन को हरि का ही आधार है॥ ४॥

4कोई पैरों में धुंघरू बाँधकर नाच रहा है।

5किसी ने व्रत-उपवास, नियम एवं माला पहनी हुई है,

6किसी ने अपने माथे पर गोपीचन्दन का तिलक लगाया हुआ है,

7परन्तु मुझ दीन ने ईश्वर का ही ध्यान किया है॥ ५॥

8कोई मनुष्य सिद्धों की ऋद्धियाँ सिद्धियाँ वाले कारनामे दिखा रहे हैं,

9किसी ने पेश बनाकर अपने बहुत आश्रम बना लिए हैं,

10कोई तंत्र-मंत्र की विद्या में प्रवृत्त रहता है।

11परन्तु मैं गरीब तो परमात्मा की उपासना में ही लीन रहता हूँ॥ ६॥

12कोई स्वयं को चतुर पण्डित कहलवाता है,

13कोई छः कर्मों में प्रवृत्त रहता है और शिव की पूजा करता है,

14कोई शुभ कर्म एवं धर्म-कर्म करता है

15परन्तु मुझ दीन ने परमात्मा की ही शरण ली है॥ ७ ॥

16मैंने सब युगों के धर्म-कर्म का भलीभांति विश्लेषण कर लिया है,

17परन्तु नाम के बिना यह मन किसी अन्य धर्म-कर्म को उचित नहीं समझता।

18हे नानक ! जब साधुओं की संगति प्राप्त हुई तो

19सारी तृष्णा बुझ गई और मन शान्त हो गया ॥ ८ ॥ १॥

20रामकली महला ५ ॥

21हे जीव ! जिसने वीर्य रूपी बूंद से तुझे उत्पन्न किया है और

22मिट्टी को लेकर तेरा शरीर बनाया है,

23जिसने बुद्धि की ज्योति एवं सोचने परखने का ज्ञान देकर

24माता के गर्भ में तेरी रक्षा की है॥ १॥

25हे जीव ! अपने रचयिता एवं रखवाले का चिंतन कर;

26मन के सब विचार छोड़ दे॥ १॥ रहाउ॥

27जिसने तुझे माता-पिता दिए हैं,

28जिसने तुझे भाई, पुत्र एवं साथी दिए हैं,

29जिसने तुझे पत्नी और मित्र दिए हैं,

30उस ठाकुर जी को अपने हृदय में बसाकर रखो ॥ २॥

31जिसने तुझे अमूल्य पवन दी है,

32जिसने तुझे निर्मल जल दिया है,

33जिसने तुझे अग्नि एवं ईधन दिया है,

34हे मन ! उस मालिक की शरण में पड़े रहो॥ ३॥

35जिसने तुझे छत्तीस प्रकार का अमृत भोजन दिया है,

36जिसने भोजन को तेरे पेट में ठहरने के लिए स्थान बनाया है,

37जिसने तुझे धरती एवं उपयोग के लिए सामग्री दी है,

38उस ठाकुर जी के चरणों को अपने चित्त में बसाकर रखो॥ ४॥

39जिसने देखने के लिए ऑखें, सुनने के लिए कान,

40काम करने के लिए हाथ, सूंघने के लिए नाक और स्वाद के लिए जीभ दी है,

41चलने के लिए पैर और सिर को सब अंगों में शीर्ष बनाया है,

42हे मन ! उस मालिक के चरणों की पूजा अर्चना करो।॥ ५॥

43जिसने तुझे अपवित्र से पवित्र कर दिया है,

44सब योनियों में तेरा मानव-जन्म उत्तम बना दिया है,

45अब यह तेरे ही वश में है किं तू उसका सिमरन करके अपना जीवन सफल कर ले।

46हे मन ! प्रभु का ध्यान करने से सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।६॥

47लोक-परलोक में एक वही मौजूद है।

48जिधर किधर भी देखता हूँ, उधर ही परमात्मा नजर आता है।

49उसकी भक्ति करने के लिए मन में क्यों आलस्य पैदा होता है

50जिसे विस्मृत करने से एक पल भी जीवन निर्वाह नहीं होता॥ ७॥

51हम जीव अपराधी एवं गुणविहीन हैं,

52न कोई सेवा-भक्ति की है और न ही कोई शुभ कर्म किया है,

53किन्तु अहोभाग्य से गुरु रूपी जहाज मिल गया है।

54हे नानक ! उस गुरु के संग लगकर हम पत्थर जीव भी संसार-सागर से पार हो गए हैं।॥ ८ ॥ २ ॥

55रामकली महला ५ ॥

56कोई अपना जीवन दुनिया की रंगरलियों, रसों एवं सौन्दर्य में ही व्यतीत करता है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं