सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 911 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji

1परमेश्वर ने अपनी कृपा की गुरु रूपी पारस को छूने से गुणवान रूपी पारस बन गया हूँ॥ २॥

2कुछ लोग वेष बनाकर होकर फिरते हैं और उन्होंने अपनी जीवन बाजी जुए में हार दी है॥ ३॥

3कोई राम-नाम हृदय में बसाकर रात-दिन भक्ति करता है ॥ ४॥

4वे रात-दिन सहजावस्था में मस्त होकर हैं और सहज ही अपने अहंत्व को मिटा दिया है।॥ ५॥

5भगवान के श्रद्धा-भय के बिना भक्ति नहीं हो सकती, इसलिए उन्होंने भय एवं भक्ति-भाव से अपना जीवन संवार लिया ॥ ६ ॥

6ज्ञान-तत्व का विचार करके उन्होंने शब्द द्वारा मोह-माया को जला दिया है॥ ७ ॥

7परमेश्वर स्वयं ही सब करवाता है और वह स्वयं ही कृपा का भण्डार है॥ ८ ॥

8उसके गुणों का अन्त नहीं पाया जा सकता, मैं शब्द द्वारा विचार करके उसका स्तुतिगान करता हूँ॥ ६॥

9अपना अहंत्व दूर करके परमात्मा का जाप करता हूँ और उसकी ही स्तुति करता हूँ॥ १०॥

10मैंने नाम पदार्थ गुरु से प्राप्त किया है, सच्चे प्रभु के नाम का भण्डार अक्षय है॥ ११॥

11परमात्मा अपने भक्तों पर मेहरबान हो गया है, उसने कृपा करके नाम-रूपी कला हृदय में रख दी है॥ १२ ॥

12उन्हें सदैव रहते सत्य-नाम की भूख लगी रहती है और शब्द का चिंतन करके प्रभु का गुणगान करते रहते हैं।॥ १३॥

13यह प्राण एवं शरीर सबकुछ उसकी देन है, इसलिए उसके दान का वर्णन एवं विचार करना बहुत कठिन है॥ १४॥

14जो शब्द से लगे हैं, उनका ही उद्धार हुआ है और वही भवसागर से पार हो गए हैं।॥ १५॥

15सच्चे परमात्मा के बिना कोई भी पार नहीं हो सकता, परन्तु कोई विरला ही इस तथ्य को सोचता-समझता है॥ १६॥

16प्रारम्भ से ही जो भाग्य में लिखा हुआ है, यही प्राप्त हुआ है और प्रभु से मिलकर शब्द द्वारा जीवन संवार लिया है॥ १७॥

17शब्द में लीन काया सोने की तरह हो गई है और सच्चे नाम के प्यार में ही लीन है ॥ १८ ॥

18यह काया नामामृत से भरपूर रहती है, पर आज काया शब्द का चिंतन करने से है प्राप्त होती है ॥ १९ ॥

19जो व्यक्ति प्रभु की खोज करते हैं, उसे पा लेते हैं परन्तु अन्य अहंकारी जीव अपने अहंकार में ही मर मिट जाता है।॥ २०॥

20वाद-विवाद करने वाले जीव नाश हो जाते हैं पर गुरु से प्रेम करने वाला सेवक उसकी ही सेवा करता है॥ २१॥

21सच्चा योगी यही है, जो अहम् एवं तृष्णा को मिटाकर ज्ञान-तत्प का चिंतन करता है॥ २२॥

22हे परमेश्वर ! जिस पर तुम्हारी कृपा हुई है, उसने दाता सतगुरु को पहचान लिया है॥ २३॥

23माया में लगे हुए जीव सतगुरु की सेवा नहीं करते और ऐसे अहंकारी डूबकर मर जाते हैं।॥ २४ ॥

24जब तक जीवन-सॉसें हैं, तब तक सेवा करनी चाहिए, इस प्रकार राम मिल जाता है॥ २५ ॥

25जिन्हें अपने प्रिय प्रभु की प्रीति लग जाती है, वे दिन-रात जाग्रत रहते हैं।॥ २६॥

26मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ और अपना तन-मन सबकुछ उस पर न्यौछावर करता हूँ॥ २७ ॥

27यह मोह-माया तो नाशवान है, शब्द का चिंतन करने से उद्धार हो सकता है॥ २८॥

28गुरु के शब्द का विचार करके वही अज्ञान से जागते हैं, जिन्हें प्रभु ने स्वयं सचेत किया है॥ २६ ॥

29हे नानक ! जो नाम-स्मरण नहीं करते, वही जीव मरे हैं और भक्त तो शब्द का विचार करके जीते रहते हैं। ३० ॥ ४॥१३॥

30रामकली महला ३ ॥

31नाम का खजाना गुरु से प्राप्त किया है, जिससे अब मैं तृप्त एवं संतुष्ट रहता हूँ॥ १॥

32हे संतजनो ! गुरु के सान्निध्य में मुक्ति एवं परमगति प्राप्त हुई है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं