गुरु ग्रंथ साहिब 910 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji
1जो काया रूपी नगरी में शब्द की खोज करता है, उसे नाम रूपी हो जाती है। २२ ॥
2जब मन अभिलाषा को त्यागकर सहजावस्था में लीन होता है तो बिना रसना के ही परमात्मा की स्तुति करने लगता है॥ २३॥
3नेत्र हैरान होकर उसकी लीला देख रहे हैं और चित अदृष्य प्रभु के ध्यान में लगा हुआ है॥ २४॥
4परमात्मा सदैव अदृष्ट एवं रहता है और ज्योति परमज्योति में मिला ली है॥ २५ ॥
5मैं तदैव अपने गुरु की स्तुति हूँ, जिसने सत्य का ज्ञान प्रदान किया है। २६ ॥
6नानक एक विनती करता है केि नाम से एवं शोभा प्राप्त होती है॥ २७ ॥ २ ॥ ११ ॥
7रामकली महला ३ ॥
8हे संत पुरुषो ! ईश्वर की पूजा दुर्लभ है और इसकी महिमा के बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता॥ १॥
9हे सज्जनो ! गुरु द्वारा ही पूर्ण प्रभु पाया जा सकता है और
10गुरु ने सदा परमेश्वर की पूजा करवाई है॥ १॥ रहाउ॥
11परमेश्वर के बिना सब कुछ अपवित्र है, फिर उसकी पूजा के लिए क्या अर्पित किया जाए ? ॥ २ ॥
12जो सच्चे परमेश्वर को मंजूर है, उसकी रज़ा को मन में बसाना ही वास्तव में उसकी पूजा-अर्चना करना है॥ ३॥
13हे सज्जनो ! सब लोग पूजा करते हैं, परन्तु मनमुखी जीव की पूजा स्वीकार नहीं होती॥ ४॥
14हे संतो ! यदि शब्द द्वारा अहम् को मिटा दिया जाए तो मन निर्मल हो जाता है और यही पूजा ईश्वर को मंजूर होती है॥ ५ ॥
15जो भक्तजन एक शब्द में ध्यान लगाते हैं, वही पवित्र-पावन एवं सत्यशील हैं।॥ ६ ॥
16नाम-सिमरन के बिना कोई अन्य पूजा स्वीकार नहीं होती और सारी दुनिया यों ही भ्रम में भूली हुई है॥ ७॥
17हे संतजनो ! गुरुमुख आत्म-ज्ञान को पहचान लेता है और उसकी राम-नाम में लगन लग जाती है।॥ ८ ॥
18ईश्वर स्वयं ही गुरुमुख से पूजा करवाता है और गुरु-शब्द द्वारा उसका जीवन सफल हो जाता है॥ ९ ॥
19कुछ लोग पूजा तो करते हैं मगर पूजा की विधि को नहीं जानते, उन्होंने द्वैतभाव में फँसकर मन को अहम् रूपी मैल लगा ली है॥ १० ॥
20जो व्यक्ति गुरुमुख बन जाता है, वह पूजा के तथ्य को जान लेता है और ईश्वरेच्छा को मन में बसा लेता है॥ ११॥
21हे संतजनो ! ईश्वरेच्छा को मानने से ही सर्वसुख प्राप्त होते हैं और अंत में नाम ही सहायक बन जाता है॥ १२॥
22हे संतो ! जो आत्मज्ञान को नहीं पहचानता, वह झूठी ही प्रशंसा करता है॥ १३॥
23पाखण्ड करने से यम उन्हें नहीं छोड़ता और उनका मान-सम्मान छीन कर पकड़ कर ले जाता है।॥ १४॥
24जिनके अन्तर्मन में शब्द का निवास हो जाता है, वह अपने आत्म-ज्ञान को पहचान लेता है और उसकी परमगति हो जाती है।॥ १५ ॥
25यह मन शून्य समाधि लगा लेता है और उसकी ज्योति परमज्योति में विलीन हो जाती है॥ १६॥
26सत्संगति में मिलकर गुरुमुख नाम की स्तुति सुनकर दूसरों को भी नाम का ही बखान करते हैं।॥ १७॥
27गुरुमुख परमात्मा का यशगान करता है और सत्य के दरबार में शोभा का पात्र बनता है॥ १८॥
28गुरु की सच्ची वाणी ने सत्य का ही बखान किया है और सत्य नाम में ही लगन लगाई है॥ १९ ॥
29मेरा प्रभु भयभंजन, पापों का खंडन करने वाला है और अंत में वही हमारा सहायक बनता है। २०॥
30हे नानक ! सबकुछ अपने आप ही घटित हो रहा है और नाम से ही शोभा मिलती है॥ २१॥ ३॥ १२॥
31रामकली महला ३ ॥
32हम बड़े मैले, आचरणहीन एवं अभिमानी थे, पर शब्द-गुरु से मिलकर सारी मैल उतार दी ॥१॥
33हे संतजनो ! गुरु ने नाम-सिमरन द्वारा उद्धार कर दिया है।
34सच्चा-नाम हृदय में स्थित है, कर्तार ने स्वयं ही जीवन-संवार दिया है॥ १॥ रहाउ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं