सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 90 · Siree Raag

1महला ३॥

2सुहागिन जीव-स्त्री सतिगुरु की रज़ा में प्रेमपूर्वक नाम में मग्न रहती है।

3वह सत्य-प्रेम से अपने पति-प्रभु के साथ सदैव ही रमण करती है।

4वह बड़ी सुन्दर रूप वाली सुन्दरी एवं शोभावान नारी है।

5हे नानक ! मिलाने वाले पति-प्रभु ने नाम में मग्न हुई सुहागिन को अपने साथ मिला लिया है ॥ २ ॥

6पउड़ी॥

7हे भगवान ! माया-मोह के जाल में से जिन जीवों को तूने निकाला है, वे सभी तेरी महिमा-स्तुति करते हैं।

8जिन जीवों की तूने पापों से रक्षा की है, वे सभी तुझे नमन करते हैं।

9हे हरि ! तुम मान-हीनों के मान हो, तुम बलशालियों में बलशाली हो।

10हे प्रभु ! तूने अहंकारियों को दण्डित करके झुका दिया है, मनमुख विमूढ़ जीवों का तूने ही सुधार किया है।

11हे भगवान ! तुम हमेशा ही अपने निर्धन एवं अनाथ भक्तों को मान-प्रतिष्ठा प्रदान करते हो ॥१७॥

12श्लोक महला ३॥

13जो व्यक्ति सतिगुरु की रजा अनुसार चलता है, वह बड़ा यश प्राप्त करता है।

14हरि का उत्तम नाम उसके हृदय में वास करता है और इस नाम को उसके हृदय में से कोई भी मिटा नहीं सकता।

15जिस पर ईश्वर अपनी कृपा करता है, वह शुभ कर्मों के कारण भाग्य से नाम को प्राप्त कर लेता है।

16हे नानक ! सृष्टि की तमाम रचना का कारण परमात्मा के अधीन है, कोई गुरमुख व्यक्ति ही इस भेद को समझता है ॥ १ ॥

17महला ३ ॥

18हे नानक ! जो व्यक्ति हरि के नाम का सिमरन करते हैं, वह रात-दिन ईश्वर के एक रस स्नेह में बसते हैं।

19भगवान की दासी माया उनकी सेवा करती है,

20संवारने वाले प्रभु के हुक्म में पूर्ण सतिगुरु ने उन व्यक्तियों को गुणों से पूर्ण कर दिया है।

21गुरु की कृपा से जिन्होंने भगवान को पहचान लिया है, उन्हें ही मोक्ष द्वार प्राप्त हुआ है।

22मनमुख व्यक्ति परमात्मा के हुक्म को नहीं जानते, इसलिए यमदूत उन्हें मारता रहता है।

23जो गुरमुख व्यक्ति ईश्वर की आराधना करते हैं, वह भयानक जगत् सागर से पार हो जाते हैं।

24गुरु जी स्वयं ही क्षमावान हैं, वह जीवों को गुण प्रदान करके उनके समस्त अवगुण मिटा देते हैं।॥ २॥

25पउड़ी।

26भगवान के भक्तों की भगवान पर पूर्ण आस्था है, हरि-प्रभु सब कुछ जानता है।

27परमेश्वर जैसा महान कोई अन्य मत समझो, हरि पूर्ण न्याय करता है।

28जब परमात्मा अन्याय करके किसी को भी मारता नहीं तो फिर हम क्यों चिंता एवं भय करें ?

29वह परमात्मा सत्य है और उसका न्याय भी सत्य है, उसके दरबार में पापी व्यक्ति ही पराजित होते हैं।

30हे भक्तजनो ! दोनों हाथ जोड़कर भगवान की महिमा-स्तुति करो। भगवान अपने भक्तजनों को भवसागर से पार कर देता है॥ १८॥

31श्लोक महला ३॥

32मेरी यही कामना है कि मैं अपने प्रियतम-प्रभु से मिली रहूँ और उसे अपने हृदय में हमेशा बसाकर रखूं।

33गुरु के स्नेह एवं अनुराग द्वारा मैं हमेशा प्रभु की स्तुति करती रहूँ ।

34हे नानक ! जिस जीव-स्त्री पर प्रभु अपनी कृपा-दृष्टि करता है, उसे वह अपने साथ मिला लेता है और वही जीव-स्त्री सुहागिन है॥ १॥

35महला ३॥

36जिस पर ईश्वर दयालु होता है, वह गुरु की सेवा से उसको पा लेता है।

37जो लोग हरिनाम की आराधना करते हैं, वह मनुष्य से देवते बन जाते हैं।

38वह अपने अहंकार को मिटा देते हैं तथा प्रभु के साथ मिल जाते हैं और गुरु के शब्द द्वारा पार हो जाते हैं।

39हे नानक ! जिन पर ईश्वर अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वह सहज ही उसमें लीन हो जाते हैं।॥ २॥

40पउड़ी ॥

41भगवान ने स्वयं ही भक्तजनों से अपनी भक्ति करवा कर उन्हें अपनी महिमा दिखाई है।

42भगवान स्वयं ही भक्तों के हृदय में अपनी आस्था उत्पन्न करता है, वह स्वयं ही उनसे अपनी सेवा करवाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं