गुरु ग्रंथ साहिब 909 · Raag Raamkalee · Guru Amar Daas Ji
1हे योगी ! यह योग नहीं है कि अपने परिवार को छोड़कर देश-दिशांतर भटकता रहे।
2शरीर रूपी घर में ही परमात्मा का नाम बस रहा है और गुरु की कृपा से प्रभु तुझे मिल सकता है॥ ८॥
3हे योगी ! यह जगत् मिट्टी का पुतला है और इसमें माया की तृष्णा का बड़ा रोग लगा हुआ है।
4चाहे कोई अनेक यत्न एवं वेष धारण करे तो भी यह रोग दूर नहीं किया जा सकता ॥ ६ ॥
5हे योगी ! हरि का नाम औषधि है, जिसके मन में नाम वसा देता है, वह इस औषधि को सेवन करके तृष्णा के रोग को मिटा देता है।
6जो गुरुमुख बन जाता है, उसे इस रहस्य का ज्ञान हो जाता है और वह योग युक्ति को प्राप्त कर लेता है॥ १०॥
7हे योगी ! सच्चे योग का मार्ग बड़ा कठिन है, इस मार्ग को वही प्राप्त करता है, जिस पर परमात्मा कृपा-दृष्टि करता है।
8वह मन से भ्रम को दूर कर देता है और अन्दर-बाहर एक परमेश्वर को ही देखता है॥ ११॥
9हे योगी ! ऐसी वीणा वजा, जो बिना बजाए ही बजती है।
10नानक कहते हैं कि हे योगी ! इस तरह तेरी मुक्ति हो जाएगी और तू सत्य में ही विलीन हो जाएगा।॥ १२॥ १॥ १०॥
11रामकली महला ३ ॥
12सतगुरु ने यही तथ्य-ज्ञान बताया है कि गुरुमुख ने ही भक्ति का खजाना समझा है॥ १॥
13हे सज्जनो ! गुरुमुख को ही बड़ाई मिलती है॥ १॥ रहाउ ॥
14यदि सदा ही सत्य में लीन रहो तो सहज ही सुख उत्पन्न हो जाता है और अन्तर्मन में से काम-क्रोध दूर हो जाता है॥ २॥
15अहंत्व को छोड़कर जिसकी नाम में लगन लग गई है, उसने शब्द द्वार ममता को जला दिया है॥ ३॥
16जिससे संसार उत्पन्न होता है, उससे ही नष्ट हो जाता है और अन्त में नाम ही जीव का साथी बनता है॥ ४॥
17जिस परमात्मा ने सृष्टि-रचना की है, उसे अपने पास ही समझो एवं दूर मत देखो ॥ ५॥
18सच्चा शब्द हृदय में ही व्याप्त है, इसलिए सत्य में ही ध्यान लगाओ॥ ६॥
19सत्संगति में अमूल्य नाम किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होता है॥ ७॥
20भ्रम में फँसकर भूल मत करो; अपितु श्रद्धा से सतगुरु की सेवा करो और अपने मन को संयमित करो ॥ ८॥
21नाम के बिना सारी दुनिया भटकती फिरती है और अपना जन्म व्यर्थ गंवा रही है॥ ६॥
22यदि चारों दिशाओं में भटककर योग की युक्ति गंवा दी तो पाखण्ड करने से योग की प्राप्ति नहीं होती ॥ १० ॥
23सत्यखण्ड रूपी सत्संग में ध्यान लगाकर आसन पर बैठकर गुरु के शब्द द्वारा योग-युक्ति प्राप्त हो सकती है॥ ११॥
24शब्द-गुरु द्वारा इधर-उधर की भटकन को मिटाया जाए तो मन में नाम का निवास हो जाता है॥ १२ ॥
25हे सज्जनो ! यह मानव-शरीर पावन सरोवर है, जो इसमें स्नान करता है, उसका ही परमात्मा में ध्यान लगता है॥ १३ ॥
26जो व्यक्ति नाम रूपी सरोवर में स्नान करते हैं, उनका मन निर्मल हो जाता है और शब्द द्वारा उनकी मैल दूर हो जाती है।॥१४॥
27तीन गुणों में लीन जीव ज्ञानहीन होते हैं, इसलिए वे नाम-स्मरण नहीं करते और नाम के बिना वे नाश हो जाते हैं। ॥१५ ॥
28ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश जैसी त्रिमूर्ति भी तीन गुणों के कारण भ्रम में भुली हुई है।॥ १६॥
29गुरु की कृपा से जब तीन गुणों से छुटकारा हो जाता है तो तुरीयावस्था प्राप्त हो जाती है और परमात्मा में ध्यान लग जाता है ॥ १७ ॥
30पण्डित ग्रंथों को पढ़-पढ़कर वाद-विवाद ही करते हैं और उन्हें सत्य का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। १८॥
31हे भाई! जो माया रूपी विष के नशे में मस्त होकर भ्रम में भूले हुए हैं, उन्हें उपदेश देने का कोई लाभ नहीं ॥ १९ ॥
32भक्तजनों की उत्तम वाणी युग-युगान्तरों से प्रगट हो रही है॥ २० ॥
33जो वाणी में लगन लगाता है, उसकी गति हो जाती है और शब्द द्वारा सत्य में हो जाता है॥ २१ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं