गुरु ग्रंथ साहिब 908 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश एक परमेश्वर का ही रूप हैं और वह स्वयं ही सबकुछ करने वाला है॥ १२ ॥
2जो आत्म-तत्व का चिंतन करता है, वह अपने शरीर को शुद्ध करके भवसागर से तैर जाता है। १३॥
3गुरु की सेवा करने से सदा सुख ही प्राप्त होता है और अन्तर्मन में गुणकारी शब्द समाया रहता है। १४॥
4जिसने अपने अभिमान एवं तृष्णा को मिटा दिया है, गुणों के दाता ईश्वर ने स्वयं ही उसे अपने साथ मिला लिया है॥ १५ ॥
5जो माया के तीन गुणों को मिटाकर तुरीयावस्था में रहता है, यही निराली भक्ति है॥ १६॥
6गुरुमुख का योग यही है कि वह शब्द द्वारा आत्मा को पहचान ले और हृदय में ईश्वर का सिमरन करता रहे।१७ ॥
7शुभ आचरण यही है कि मन स्थिर हो जाए और शब्द में लीन रहे॥ १८ ॥
8हे योगी ! वेदों के वाद-विवाद एवं पाखण्ड में नहीं पड़ना चाहिए, अपितु गुरुमुख बनकर शब्द का चिंतन करना चाहिए॥ १६॥
9हे योगी ! जो गुरुमुख बनकर योग-साधना करता है, वही यतीत्व, सदाचारी है और शब्द का चिंतन करता है॥ २o ॥
10हे योगी ! जिसने शब्द द्वारा अपने अभिमान को मिटाकर मन को नियंत्रण में कर लिया है, उसने ही योग-युक्ति को पहचाना है॥ २१॥
11हे योगी ! माया मोह के भवसागर से गुरु शब्द द्वारा पार हुआ जाता है और अपने कुल-परिवार को भी पार किया जा सकता है। ॥२२॥
12हे योगी ! चारों युगों में वही शूरवीर माना गया है, जिसने शब्द का चिंतन एवं वाणी द्वारा प्रभु की भक्ति की है॥ २३॥
13हे योगी ! यह मन माया के मोह में फँसा हुआ है जो शब्द के चिंतन द्वारा ही इससे निकल सकता है।॥ २४॥
14नानक कहते हैं कि हे परमेश्वर ! जो तेरी शरण में आता है, तू उसे क्षमा करके अपने साथ मिला लेता है ॥२५ ॥ ६ ॥
15रामकली महला ३ असटपदीआ
16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
17हे योगी ! मेहनत एवं शालीनता की कानों में मुद्राएँ धारण कर और दया को तू अपनी कफनी बना।
18यदि तू जन्म-मरण की भय रूपी विभूति अपने शरीर पर लगा ले तो समझ लेना तीनों लोकों को जीत लिया है। १॥
19हे योगी ! ऐसी वीणा बजाना,
20जिस वीणा से तेरे मन में अनहद शब्द बजता रहे और परमात्मा में तेरा ध्यान लगा रहे॥ १॥ रहाउ ॥
21हे योगी ! सत्य-संतोष को अपना पात्र एवं झोली बना और उसमें नामामृत रूपी भोजन डाल।
22तू ध्यान को अपना डंडा बना और अपनी सुरति को बजाने वाली सिंगी बना ॥ २ ॥
23हे योगी ! अपने मन को स्थिर करके आसन लगाकर बैठ, तो तेरी कल्पना मिट जाएगी।
24यदि तू शरीर रूपी नगरी में भिक्षा मांगने जाएगा तो तुझे नाम-दान प्राप्त होगा ॥ ३॥
25हे योगी ! यदि इस वीणा द्वारा ध्यान नहीं लगता तो तुझे सत्य की प्राप्ति नहीं होगी।
26यदि इस वीणा द्वारा शान्ति नहीं मिलती तो तेरे मन का अभिमान दूर नहीं होता॥ ४॥
27हे योगी ! तू अपनी वीणा को परमात्मा के भय एवं प्रेम के दो तूंबे लगा और शरीर को इसकी डण्डी बना।
28यदि तू गुरुमुख बन जाए तो तेरे प्रेम की तंती तेरे हृदय में बजती रहेगी और इस विधि से तेरी तृष्णा नाश हो जाएगी॥ ५ ॥
29वही सच्चा योगी कहलाता है, जो परमेश्वर से चित्त लगाता है और उसके हुक्म को बूझता है।
30उसका सन्देह मिट जाता है, मन निर्मल हो जाता है और इस तरह योग की युक्ति को हासिल कर लेता है॥ ६ ॥
31जो कुछ नजर आ रहा है, वह नाशवान है। इसलिए परमात्मा में ही अपना चित्त लगाओ।
32यह सूझ तुझे तभी होगी, जब सतगुरु से तेरी श्रद्धा बन जाएगी॥ ७॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं