गुरु ग्रंथ साहिब 907 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1जब जीव जगत् में आया तो परमेश्वर ने ही भेजा था। अब उसके आहान पर ही जगत् से जा रहा है।
2जो उसने करना है, वह कर रहा है। उस क्षमावान ने स्वयं ही क्षमा कर दिया है॥ १०॥
3जिन्होंने यह राम-रस चखा है, उनकी संगति में सत्य की खोज करके उसे पाया है
4ऋद्धियाँ सिद्धियों, बुद्धि एवं ज्ञान गुरु से ही प्राप्त होता है और उसकी शरण में आने से ही मोक्ष मिलता है॥ ११॥
5गुरुमुख ने ही दुख सुख को एक समान समझा है और वह खुशी-गम से निर्लिप्त हो गया है।
6हे नानक ! गुरुमुख ने अपने आत्माभिमान को मिटाकर परमात्मा को पा लिया है और यह सहज ही सत्य में विलीन हो गया है॥ १२ ॥ ७ ॥
7रामकली दखणी महला १ ॥
8गुरु ने यतीत्व, सदाचार, संयम एवं सत्य ही दृढ़ करवाया है, जिससे सच्चे शब्द के रस में लीन रहता हूँ॥ १॥
9मेरा गुरु दयालु है और सदा सत्य के रंग में लीन रहता है।
10रात-दिन उसका ध्यान परमात्मा में ही लगा रहता है और सत्य के दर्शन करके वह संतुष्ट रहता है।॥ १॥ रहाउ॥
11वह दशम द्वार में रहता है, सबको एक ही दृष्टि से देखता है और अनहद शब्द के रंग में लीन रहता है। २।
12वह सत्य की कौपीन बांधकर परमेश्वर में रत रहता है और उसकी जीभ हरि-रस के रंग में लीन रहती है॥ ३॥
13जिन्हें गुरु मिल जाता है, वे सत्य में ही आस्था रखते हैं और शुभकर्मों में ही संतुष्ट रहते हैं।॥ ४॥
14सतगुरु ने यह रहस्य दिखा दिया है कि एक परमेश्वर में ही सब का निवास है और एक परमेश्वर ही सब में वास कर रहा है॥ ५ ॥
15जिसने खण्ड-मण्डल, ब्रह्माण्ड की रचना की है, उस प्रभु को देखा नहीं जा सकता ॥ ६॥
16गुरु ने ज्योति रूपी दीपक से ज्ञान का दीपक जगा दिया है और तीनों लोकों में फैली प्रभु-ज्योति दिखा दी है॥ ७॥
17उस परमात्मा का सिंहासन एवं महल सत्य है, जहाँ निर्भय होकर उसने समाधि लगाई है॥ ८॥
18उस वैरागी योगी ने सारे जगत् को मोहित कर दिया है और घट-घट में अनहद शब्द रूपी वीणा बजा दी है॥ ९॥
19हे नानक ! प्रभु की शरण में आने से ही छुटकारा होता है, क्योंकि सच्चा सतगुरु सहायक बन जाता है॥ १० ॥ ८ ॥
20रामकली महला १ ॥
21जिसने धरती एवं गगन में अपनी सत्ता को धारण किया हुआ है, हृदय में स्थित प्रभु ने मानव-शरीर को अपना घर बनाया हुआ है।॥ १॥
22हे संतो ! गुरु ने शब्द द्वारा कितने ही लोगों का उद्धार कर दिया है।॥ १॥ रहाउ ॥
23हे परमपिता ! जो व्यक्ति अपनी ममता को मारकर अपने आत्माभिमान को मिटा देता है, उसे तीनों लोकों में तेरी ही ज्योति नजर आती है॥ २ ॥
24ऐसा व्यक्ति सतगुरु के शब्द का चिंतन करके अपनी इच्छाओं को मारकर सत्य को ही मन में धारण करता है॥ ३॥
25उसके मन में अनहद शब्द रूपी सिंगी बजती रहती है, जिसे चेतना द्वारा सुनता रहता है और घट-घट में तेरी ही ज्योति देखता है॥ ४॥
26जहाँ सारे जगत् में अनहद शब्द रूपी वीणा बज रही है, उसने अपना मन वहाँ ही रखा हुआ है और अपने अन्तर्मन में ब्रह्म-अग्नि प्रज्वलित कर ली है॥ ५ ॥
27पृथ्वी, आकाश, पवन, जल एवं अग्नि-इन पाँच तत्वों से मिलकर बने हुए मानव शरीर में अपार प्रभु की निर्मल ज्योति का दीपक दिन-रात जगता रहता है॥ ६॥
28सूर्य चन्द्रमा शरीर रूपी वीणा के तूंघे हैं और निराली ही अनहद शब्द रूपी वीणा बजती रहती है॥ ७॥
29हे योगी ! उस अलक्ष्य, अगम्य एवं अपरंपार परमात्मा का दसम द्वार में आसन लगा हुआ है॥ ८॥
30यह मन काया रूपी नगरी का राजा है और चिन्तनशील पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ इसमें रहती है॥ ६॥
31मन रूपी राजा हृदय-घर में आसन लगाकर शब्द में लीन रहता है और गुणवान बनकर पूर्ण न्याय करता है।॥ १०॥
32जो मन को मारकर जीवन्मुक्त हो जाता है, काल भी उस बेचारे जीव का कुछ नहीं बिगाड़ सकता॥ ११॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं