गुरु ग्रंथ साहिब 906 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1तीर्थ-यात्रा करने से भी रोग दूर नहीं होते।
2प्रभु नाम के बिना कैसे सुख प्राप्त हो सकता है। ४॥
3चाहे मनुष्य कितना ही प्रयास करे, किन्तु वह अपने वीर्य को नियंत्रण में नहीं कर सकता।
4उसका मन डगमगाता रहता है और वह नरक में ही पड़ता है।
5वह यमपुरी में बंधा हुआ दण्ड भोगता है और
6नाम के बिना मन जलता ही रहता है।॥ ५॥
7कितने ही सिद्ध-साधक, ऋषि-मुनि एवं देवता
8हठ निग्रह द्वारा अपने मन की तृष्णा को तृप्त नहीं कर सकते।
9जो शब्द का चिंतन करते हैं, गुरु की सेवा में लीन रहते हैं,
10उनका मन-तन निर्मल हो जाता है और अभिमान मिट जाता है।॥ ६॥
11परमात्मा की कृपा से जिसे गुरु मिल जाता है, उसे सत्य नाम प्राप्त हो जाता है।
12हे प्रभु! मैं बड़ी श्रद्धा से तेरी शरण में रहता हूँ और
13तुम से ही भक्ति-भावना पैदा होती है।
14गुरु से हरि-नाम का मंत्र लेकर उसका ही जाप जपता रहता हूँ॥ ७ ॥
15मन के नाम-रस में भीगने से अहंत्व एवं घमण्ड दूर हो जाता है।
16पाखण्ड करने एवं झूठ बोलने से सत्य की प्राप्ति नहीं होती।
17शब्द-गुरु के बिना सत्य का घर प्राप्त नहीं होता।
18हे नानक ! गुरुमुख बनकर परमतत्व का चिंतन करो ॥ ८ ॥ ६॥
19रामकली महला १ ॥
20हे भोले प्राणी ! जैसे तू आया है, वैसे ही यहाँ से चले जाना है। जैसे तुझे जन्म मिला है, वैसे ही तेरी मृत्यु हो जानी है।
21जैसे तूने रस-भोग किए हैं, उतना ही दुख लगा है। नाम को भुलाकर तू संसार-सागर में पड़ गया है॥ १॥
22अपने तन एवं धन को देख-देखकर तू अभिमान में फंस गया है।
23तू सोना चाँदी एवं सुन्दर नारी से प्रेम बढ़ाकर नाम को भुलाकर भ्रम में पड़ गया है॥ १॥ रहाउ॥
24तूने यतीत्व, सदाचार, संयम एवं शील को धारण नहीं किया और प्रेत जैसा शरीर पिंजरे में पड़ा सूख कर लकड़ी हो गया।
25न कोई दान-पुण्य किया, न तीर्थ-स्नान किया, न ही संयम किया, साधु-महापुरुषों की संगति के बिना व्यर्थ ही जीवन बीत गया।॥ २॥
26लालच में फँसकर तूने नाम को भुला दिया, जिससे जन्म-मरण का चक्र पड़ गया है।
27जब यम केशों से पकड़ कर मारता है तो जीव को कोई ख्याल नहीं रहता और वह मृत्यु के मुँह में चला जाता है॥ ३॥
28तू रात-दिन पराई निन्दा, चुगली एवं इर्षा में ही पड़ा रहा है, जिससे तेरे हृदय में न ही नाम का वास है और न ही सबके प्रति दया है।
29गुरु के शब्द के बिना तेरी गति नहीं होनी और न ही सम्मान प्राप्त होना है। राम-नाम के बिना तूने नरक में ही जाना है॥ ४॥
30एक क्षण में ही तू नट की तरह वेष धारण कर लेता है और मोह-पाप में लीन रहता है।
31इधर-उधर माया का प्रसार देखकर तू मोह-माया में ही मग्न हो गया है॥ ५ ॥
32तू बड़े पाप-विकार का विस्तार करता है और शब्द के ज्ञान के बिना भ्रम में पड़ा हुआ है।
33तुझे अहम् रोग रूपी बड़ा दुख लगा हुआ है। गुरु-उपदेश ग्रहण करो, तेरा रोग दूर हो जाएगा ॥ ६॥
34जब पदार्थवादी इन्सान घर में सुख-संपति को आते देखता है तो उसका मन अभिमान का शिकार हो जाता है।
35जिस परमात्मा ने यह तन एवं धन दिया हुआ है, जब वह वापिस ले लेता है तो उसके मन में चिंता एवं दुख पैदा हो जाता है॥ ७॥
36अन्तिम समय कुछ भी साथ नहीं जाता, जो कुछ नजर आता है, सब उसकी माया है।
37आदिपुरुष प्रभु अपरंपार है, हरि-नाम को हृदय में बसाने से भवसागर से पार हुआ जा सकता है॥ ८॥
38हे जीव ! अपने मृतक रिश्तेदार पर रो रो कर किसे सुना रहा है? तू स्वयं ही भवसागर में गिर रहा है।
39पदार्थवादी जीव अपने परिवार, माया एवं सुन्दर घर-महल को देखकर व्यर्थ जंजाल में फँसा हुआ है॥ ९ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं