गुरु ग्रंथ साहिब 905 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1गुरु की कृपा से जिसे परमात्मा के नाम का आधार मिल गया है,
2करोड़ों में कोई विरला ही प्रभु का भक्त है॥ ७॥
3दुनिया में चाहे कोई बुरा अथवा भला है, लेकिन एक परमात्मा ही सत्य है।
4हे ज्ञानी ! सतगुरु का सहारा लेकर इस रहस्य को समझो।
5गुरु से उपदेश लेकर किसी विरले ने एक ईश्वर को समझा है और
6वह आवागमन मिटा कर सत्य में ही विलीन हो गया है॥ ८॥
7जिसके हृदय में ऑकार है,
8वह सर्वगुणसम्पन्न सच्चे प्रभु का चिंतन करता है।
9हे नानक ! ऐसा जीव गुरु की रज़ानुसार कर्म करता है और
10परम सत्य में ही विलीन हो जाता है॥ ६ ॥ ४॥
11रामकली महला १ ॥
12हठयोग की क्रिया एवं इन्द्रियों को निग्रह करने से काया क्षीण हो जाती है।
13व्रत-उपवास एवं तपस्या करने से भी मन संतुष्ट नहीं होता।
14राम-नाम के समान अन्य पहुँचने वाला नहीं है॥ १॥
15हे मन ! गुरु की सेवा करो और भक्तजनों की संगति करो।
16हरि का रस पीने से निर्दयी यमदूत भी पास नहीं आते और माया रूपी नागिन भी डंक नहीं मार सकती ॥ १॥ रहाउ॥
17समूचा जगत् वाद-विवाद में पड़ा रहता है और रागों संगीत द्वारा प्रसन्न होता रहता है।
18त्रिगुणात्मक माया रूपी विष में पड़कर जीव जन्मता-मरता रहता है और
19राम-नाम के बिना बड़ा दुख सहन करता है॥ २।
20योर्गी प्राणायाम करता है और आसन पर बैठकर बड़ा प्रसन्न होता है।
21वह निउली कर्म एवं छः हठयोग कर्म भी करता रहता है लेकिंन
22राम नाम के बिना वह व्यर्थ सॉस लेता है ३॥
23जब अन्तर्मन में काम-क्रोध इत्यादि पॉच विकारों की अग्नि जलती रहती है तो कैसे धैर्य हो सकता है।
24अन्तर्मन में कामादिक चौरों का वास है, फिर जीवन का कैसे स्वाद मिल सकता है ?
25गुरमुख बनने से शरीर रूपी किंले पर जीत प्राप्त हो सकती है। ४॥
26मन में मैल होने के कारण तीथों में भटकने का कोई फायदा नहीं है।
27यदि मन ही शुद्ध नहीं तो शौचादि करने का क्या अभिप्राय है ?
28जब भाग्य लेख ही ऐसा है तो फिर किसे दोष दिया जाए ॥ ५ ॥
29जो भोजन नहीं करता, उपवास रखता है। वह तो अपने शरीर को दुख ही देता है।
30गुरु के ज्ञान बिना जीव की तृप्ति नहीं होती और
31स्वेच्छाचारी जीव आवागमन के चक्र में पड़कर जन्मता मरता रहता है॥ ६ ॥
32सतगुरु से पूछकर भक्तजनों की संगति करनी चाहिए।
33यदि मन परमात्मा में लीन रहे तो वह जन्म-मरण से छूट जाता है।
34राम-नाम का सिमरन किए बिना अन्य धर्म-कर्म करने का कोई लाभ नहीं है॥ ७ ॥
35चूहे की तरह शोर मचा रहे मन के ख्यालों को एक तरफ कर दो।
36राम नाम का सिमरन ही सच्ची सेवा है।
37नानक प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु ! ऐसी कृपा करो केि मुझे नाम का दान मिल जाए ॥ ८ ॥ ५ ॥
38रामकली महला १ ॥
39परमात्मा के अलावा अन्य कोई भी वनस्पति इत्यादि जीवों की उत्पति करने वाला नहीं
40जिस वस्तु का भी कथन किया जाए, वह प्रभु से ही पैदा हुई है।
41युग-युगान्तरों से एक परमेश्वर ही सत्य है,
42विश्व की उत्पति एवं प्रलय करने वाला उसके अतिरिक्त कोई नहीं है।॥ १॥
43मेरा ठाकुर ऐसा गहन-गंभीर है,
44जिसने भी उसका जाप किया है, उसे ही सुख उपलब्ध हुआ है। हरि का नाम-स्मरण करने से यम का तीर नहीं लगता॥ १॥ रहाउ॥
45प्रभु का नाम अमूल्य रत्न एवं हीरा है,
46वह सच्चा मालिक अमर एवं अतुलनीय है।
47उसकी जिह्म शुद्ध एवं वचन सत्य है।
48उसका घर द्वार सदैव सत्य है और कोई अस्त-व्यस्तता नहीं है॥ २ ॥
49कोई जगलों में जाकर बैठता है तो कोई पहाड़ों में गुफा इत्यादि स्थान पर बैठ जाता है।
50ऐसे व्यक्ति नाम को भुलाकर अभिमान में पीडित होते हैं।
51परमात्मा के नाम बिना ज्ञान-ध्यान का कोई महत्व नहीं।
52गुरमुख ही सत्य के दरबार में शोभा का पात्र बनता है॥ ३॥
53जो व्यक्ति हठ एवं अहंकार करता है, उसे सत्य की प्राप्ति नहीं होती।
54कोई धार्मिक ग्रंथों का पाठ पढ़कर लोगों को सुनाता है एवं
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं