सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 900 · Raag Raamkalee

1रामकली महला ५ ॥

2परमेश्वर की लीला इतनी विचित्र है कि यदि उसकी मर्जीं हो तो अग्नि भी लकड़ी को जलाना छोड़ देती है।

3जल मिट्टी को स्वयं में घोल लेता है, पर जल मिट्टी को घोलने की जगह दसों दिशाओं से त्याग देता है अर्थात् पृथ्वी समुद्र में बसती है किन्तु समुद्र इसे स्वयं में डुबोता नहीं।

4माता के गर्भ में बालक के पैर ऊपर होते हैं और सिर नीचे होता है।

5घट में प्रकाश रूपी सिन्धु समाया हुआ है॥ १॥

6परमेश्वर सर्वकला समर्थ है,

7भक्तों को एक पल भी अपने दिल से वह नहीं भूलता, मन में आठों प्रहर उसका जाप करना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥

8सर्वप्रथम परमात्मा रूपी माखन था और तदुपरांत जगत् रूपी दूध पैदा हुआ है।

9बालक के पीने के लिए माता के स्तनों के रक्त ने साबुन जैसा सफेद शुद्ध दूध पैदा किया है।

10परमात्मा का अंश जीवात्मा निडर है किन्तु मृत्यु से डरता है।

11होनी को अनहोनी ले जाती है॥ २॥

12मनुष्य के शरीर में रहने वाली आत्मा गुप्त है, पर शरीर ही नजर आता है।

13सब को बनाकर जगदीश्वर लीला करता रहता है।

14छलने वाली माया न छले जाने वाले जीव को छल लेती हैं।

15नाम रूपो धन के बिना जीव बार-बार जन्म-मरण के चक्र में पड़ता है। ३॥

16चाहे संतों की सभा में मिलकर

17स्मृतियाँ, शास्त्र एवं वेद-पुराणों का बखान करके देख लो।

18जो ब्रहा की महिमा का विचार करता है,

19हे नानक ! उसकी परमगति हो जाती है।॥ ४ ॥ ४३॥ ५४ ॥

20रामकली महला ५ ॥

21जो ईश्वर को उपयुक्त लगा है, वही हुआ है।

22सदैव भगवान की शरण ग्रहण करो, उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है॥ १॥ रहाउ॥

23पुत्र, स्त्री एवं लक्ष्मी जो कुछ नजर आता है, इन में से कुछ भी जीव अपने साथ नहीं लेकर गया।

24माया रूपी ठग बूटी को खाकर जीव भूला हुआ है, लेकिन अन्त में माया एवं घर इत्यादि सबकुछ त्याग वह चला जाता है॥ १॥

25दूसरों की निंदा कर करके जीव बहुत दुखी हुआ है एवं अपने कर्मों के अनुसार गर्भ योनियों में पड़ता रहा है।

26पूर्व जन्म में किए कर्म जीव का साथ नहीं छोड़ते और भयानक यमदूत उसे अपना ग्रास बना लेते हैं।॥ २॥

27मनुष्य झूठ बोलता है, वह बताता कुछ और है और करता कुछ अन्य है, यह बड़ी शर्म की बात है कि उसकी तृष्णा नहीं बुझती।

28संतों पर झूठे दोष लगाने से उसके शरीर में असाध्य रोग पैदा हो जाता है, जिससे उसका शरीर नष्ट हो जाता है॥ ३ ॥

29जिस परमात्मा ने संतों को यश प्रदान किया है, उसने ही उन्हें पैदा किया है और स्वयं ही संतों की जय-जयकार करवाई है।

30हे नानक ! परब्रह्म ने अपनी कृपा करके संतों को गले से लगाकर रखा हुआ है॥ ४॥ ४४॥ ५५ ॥

31रामकली महला ५ ॥

32मेरा पूर्ण गुरुदेव ऐसा सहायक है,

33जिसका सिमरन कभी व्यर्थ नहीं जाता ॥ १॥ रहाउ ॥

34उसके दर्शन करने से मन निहाल हो जाता है,

35उसकी चरण-धूलि मृत्यु का जाल काट देती है।

36उसके चरण-कमल मेरे मन में बसे हुए हैं,

37उसने मेरे तन के सभी कार्य संवार दिए हैं।॥ १॥

38जिसके मस्तक पर मेरा प्रभु हाथ रख देता है,

39वह अनाथ भी सनाथ बन जाता है।

40वह पतितों का उद्धार करने वाला एवं कृपा का भण्डार है,

41इसलिए सदैव उस पर कुर्बान जाना चाहिए॥ २॥

42वह जिसे निर्मल नाम मंत्र का दान देता है,

43उसका अभिमान नष्ट हो जाता है और वह विकारो को त्याग देता है।

44साधुओं की संगति में केवल परमात्मा का ही ध्यान करना चाहिए।

45नाम के रंग से सब पापों का नाश हो जाता है॥ ३॥

46सब जीवों में गुरु-परमेश्वर का ही निवास है।

47वह गुणों का भण्डार घट-घट में व्यापक है।

48हे प्रभु ! तेरी ही आशा है, अपने दर्शन दीजिए।

49मेरी यही सच्ची प्रार्थना है केि नानक ने नित्य तुझे स्मरण करता रहे॥ ४॥ ४५॥ ५६॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं